अभिवृद्धि एवं विकास ,विकास की अवस्थाएं , शैशवास्था , बाल्यावस्था, किशोरावस्थाJagriti PathJagriti Path

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Wednesday, February 12, 2020

अभिवृद्धि एवं विकास ,विकास की अवस्थाएं , शैशवास्था , बाल्यावस्था, किशोरावस्था


Growth and development, stages of development, infancy, childhood, adolescence
Growth and development, stages of development, infancy, childhood, adolescence



 

विकास की अवस्थाए

शैशवास्था
बाल्यावस्था
किशोरावस्था
 में परिवर्तन एवं उनकी शिक्षा व्यवस्था
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अधिगम : अर्थपरिभाषाएंप्रकारप्रभावित करने वाले कारक

थार्नडाईक का संबंधवाद उद्दीपन-अनुक्रिया सिद्धांत S-R Theory

कोहलर का अन्तर्दृष्टि या सूझ का सिद्धांत

सामाजिक अधिगम या बाण्डुरा

स्किनर का क्रियाप्रसूत अनुबंधन सिद्धांत

पावलव का अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धांत

ब्रुनर का संरचनात्मक अधिगम

हल का पुनर्बलन सिद्धांत

जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत

 


बालक के विकास की प्रक्रिया जन्म से पूर्व जब वह माता के गर्भ में आता है, तभी से प्रारंभ हो जाती है और जन्म के बाद शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था तक क्रमशः चलती रहती है। विकास के साथ ही अभिवृद्धि का प्रत्यय भी जुड़ा है सामन्यतया दोनों को भ्रमवश एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है परन्तु दोनों में पर्याप्त अंतर है।
अभिवृद्धि का अर्थ : सामान्य रूप से अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग कोशिकीय वृद्धि के लिए किया जाता है। गर्भाधान से लेकर शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था तक व्यक्ति के विभिन्न अंगों के आकार लम्बाई तथा भार आदि में होने वाले परिवर्तनों को अभिवृद्धि कहा जाता है। फ्रेंक के अनुसार, "कोशिकीय गुणात्मक वृद्धि ही अभिवृद्धि है।"
विकास का अर्थ : सम्पूर्ण आकृति या रूप में परिवर्तन को विकास कहा जाता है। विकास सभी अभिवृद्धियों का योग होता है। विकास के कारण बालक में कार्यक्षमता एवं कार्यकुशलता आती है।
हरलॉक के अनुसार, "विकास, अभिवृद्धि तक ही सीमित नहीं है। इसकी अपेक्षा इसमें परिपक्वावस्था के लक्ष्य की ओर, परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम निहित रहता है। विकास के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में नई-नई विशेषताएँ और नई-नई योग्यताएं प्रकट होती है।"

उदाहरणार्थ : हाथ-पैरों की वृद्धि, धड़ की वृद्धि अभिवृद्धि है लेकिन इनका सम्मिलित रूप शारीरिक विकास कहलाता है।
अभिवृद्धि एवं विकास में अंतर निम्न तालिका द्वारा स्पष्ट है
   
अभिवृद्धि
विकास

1
अभिवृद्धि शरीर के किसी विशिष्ट अंग में परिवर्तन से
संबंधित है।

विकास समस्त अंगो के समन्वयात्मक समग्र का
बोधक है।

2. अभिवृद्धि को मापा एवंतौला जा सकता है।
विकास को केवल कार्य क्षमता एवं कार्यकुशलता के आधार पर अनुभव किया जा सकता है।
3. अभिवृद्धि निश्चित समय के पश्चात रूक जाती है।


विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
4. अभिवृद्धि का अर्थ संकुचित है। यह विकास के अवयवों में से एक है।
विकास का अर्थ व्यापक है। इसमें शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक सभी पक्ष शामिल है।
5. अभिवृद्धि का कोई निश्चित क्रम नहीं होता है।


विकास का एक निश्चित क्रम होता है।
6. अभिवृद्धि संरचनात्मक एवं परिमाणात्मक होती है।


  विकास क्रियात्मक एवं गुणात्मक होता है।
7. अभिवृद्धि बाह्य होती है।


 विकास आंतरिक होता है।
8. अभिवृद्धि लक्ष्य विहीन होती है।

विकास का लक्ष्य होता है।
9. अभिवृद्धि में व्यक्तिगत भेद
पाए जाते है।
विकास में समानता होती है।

 विकास के  सिद्धांत

1. निरतर विकास का सिद्धांत : इस सिद्धांत के अनुसार
विकास की प्रक्रिया निर्बाध रूप से निरंतर चलती रहत
2. विकास-दिशा का सिद्धांत : इस सिद्धांत के अनुसार बालक के विकास की दिशा सिर से पैर की ओर होती है, इसे मस्तकोधमुखी विकास कहते हैं । यह केन्द्र से परिधीय विकास भी कहलाता है।
3. समान प्रतिमान का सिद्धांत : यह सिद्धात कहत है
कि एक जाति के सभी प्राणियों का विकास एक समान प्रतिमान के अनुसार होता है।
4. एकीकरण का सिद्धांत: इस सिद्धांत के अनुसार बालक
पहले पूरे अंग का संचालन करता है फिर उस अंग के उप अंगों का तब दोनों में एकीकरण करते हुए दोनों का एक साथ संचालन करता है।
5.परस्पर संबंध का सिद्धांत : यह सिद्धांत बताता है कि विकास के सभी स्वरूप परस्पर संबंधित है, एक प्रकार का विकास अच्छा होने पर शेष विकास भी अच्छे एवं एक प्रकार का विकास बिगड़ने पर शेष विकास के स्वरूप भी बिगड़ जाते हैं। शारीरिक विकास अच्छा होने पर मानसिक विकास अच्छा एवं मानसिक विकास से संवेगात्मक विकास अच्छा तथा संवेगात्मक विकास से सामाजिक विकास अच्छा होता है।
6.विकास क्रम का सिद्धांत : इस सिद्धांत के अनुसार भाषा विकास एवं कुछ गामक विकास एक निश्चित क्रम में होते हैं। उदाहरणार्थ : भाषा के विकास में बालक पहले सुनता है
फिर बोलता है, फिर पढ़ता है और तत्पश्चात लिखता है इस क्रम को संक्षेप में L-S-R-W कहते है।
7. सामान्य एवं विशिष्ट क्रियाओं का सिद्धांत : इस सिद्धांत
के अनुसार विकास की प्रक्रिया में बालक पहले सामान्य क्रियाएं करता है और बाद में विशेष क्रियाएं करता है।
उदाहरणार्थ : बच्चा पहले करवट लेता है, बैठता है,घुटना के बल चलता है, खड़ा होता है और फिर चलता है।
8. वशानुक्रम एवं वातावरण की अन्तःक्रिया का सिद्धांत : यह सिद्धांत बताता है कि मानव का विकास न केवल वंशानुक्रम से हो सकता है और न ही केवल वातावरण से हो सकता है। बल्कि मानव विकास वंशानुक्रम एव
वातावरण की अन्तः क्रिया का परिणाम होता है।
9. व्यक्तिगतता का सिद्धांत : यह सिद्धांत बताता है कि
भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में विकास की गति भिन्न-भिन्न होती है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी गति एवं अपने ढंग से विभिन्न क्षेत्रों में अपना विकास करता है। जेसल ने लिखा है व्यक्तिगत अंतरो का फैलाव इतना
अधिक है, जितना स्वयं मानव जाति का है।
10. चक्राकार प्रगति का सिद्धांत : इस सिद्धांत के अनुसार
विकास रेखीय  गति एवं स्थिर दर से न होकर चक्राकार ढंग से होता है। दूसरे शब्दों में, विकास प्रक्रिया के दौरान बीच-बीच में ऐसे अवसर आते है जबकि किसी क्षेत्र विशेष में विकास की पूर्व अर्जित स्थिति का समायोजन करने के लिए उस क्षेत्र की विकास प्रक्रिया लगभग विराम की स्थिति में आ जाती है। कुछ अवधि के उपरान्त उसक्षेत्र में विकास की गति फिर बढ़ जाती है।
11. परिमार्जितता का सिद्धांत : इस सिद्धांत के अनुसार
विकास की दिशा तथा गति में परिमार्जन किया जा सकता है। अर्थात् विकास को वांछित दिशा एवं गति प्रदान की जा सकती है। यह सिद्धांत शैक्षिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। शिक्षा प्रक्रिया के द्वारा बालक के विकास को वांछित दिशा में तीव्र गति से अग्रसर करवाया जा सकता है।

विकास की अवस्थाएँ

अलग-अलग मनोवैज्ञानिकों ने विकास की अवस्था विभिन्न प्रकार से बताई है। जो निम्नप्रकार से है।
हिन्दू-धर्मशास्त्रों में बाल-विकास की ये अवस्थाए.
(i) जन्म से पूर्व              गर्भावस्था
(ii) जन्म से 6 वर्ष तक   शैशव अवस्था
(iii) 6 से 12 वर्ष तक     बाल्य अवस्था
(iv) 12 से 18 वर्ष तक  कौमार्य अवस्था
रॉस के अनुसार
(I) 1 से 3 वर्ष तक               शैशव अवस्था
(ii) 3 से 6 वर्ष तक             पूर्व वाल्यावस्था
(iii) 6 से 12 वर्ष तक।        उत्तर बाल्यकाल
(iv) 12 से 18 वर्ष तक।       किशोरावस्था
जोन्स के अनुसार, बाल-विकास की अधोलिखित स्पष्ट अवस्थाएँ होती है- '
 (i) जन्म से 5 वर्ष तक           शैशव
(ii) 5 से 12 वर्ष तक            बाल्यकाल
(iii) 12 से 18 वर्ष तक         किशोरावस्था
  हरलाक के अनुसार विकास की अवस्थाए निम्न प्रकार से है
जन्म पूर्व अवस्था                 गर्भाधान से जन्म तक
  शैशव                              जन्म से दूसरे सप्ताह के अंत तक
   वत्सावस्था                        दूसरे सप्ताह से दूसरे वर्ष के अंत तक 
 पूर्व बाल्यावस्था                  2 1/2  से 6 वर्ष तक
उत्तर बाल्यावस्था            6 से 12 वर्ष तक
पूर्व किशोरावस्था             13 से 17 वर्ष तक
पूर्व प्रौढ़ावस्था                21 से 40 वर्ष तक
मध्यावस्था                   40 से 60 वर्ष तक
वृद्धावस्था                      60 से मृत्युपर्यन्त
कालसनिक के अनुसार विकास की अवस्थाओं का वर्गीकरण
निम्न प्रकार से है
गर्भाधान से जन्म तक पूर्व जन्म काल
शैशव                             जन्म से 3 या 4 सप्ताह
   आरम्भिक शैशव         1 मास से 15 मास तक
   उत्तर शैशव              15 मास से 30 मास तक
   पूर्व बाल्यकाल          2 वर्ष से 5 वर्ष तक
    मध्य बाल्यकाल         5 वर्ष से 9 वर्ष तक
    उत्तर बाल्यकाल       9 वर्ष से 12 वर्ष तक
     किशोरावस्था         12 वर्ष से 21 वर्ष तक
अलग-अलग मनोवैज्ञानिकों ने विकास की अवस्थाएँ विभिन्न प्रकार से बताई है। लेकिन शैक्षणिक दृष्टिकोण से सर्वमान्य वर्गीकरण निम्न प्रकार से है
1. शैशवावस्था -              जन्म से 5 या 6 वर्ष तक
2. बाल्यावस्था                5 या 6 वर्ष से 12 वर्ष तक
3. किशोरावस्था -            13 वर्ष से 18 वर्ष तक
  4. प्रौढ़ावस्था                  19 वर्ष से अधिक
 

शैशवावस्था :

जन्म के पश्चात् विकास की प्रथम अवस्था शैशवावस्था कहलाती है। शैशवावस्था जीवन का सबसे महत्वपूर्ण काल है।
शैशवावस्था के संबंध में विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने अलगअलग कथन कहे हैं जो निम्न प्रकार से है
फ्रायड के अनुसार, “मनुष्य को जो कुछ भी बनना होता है, वह चार-पाँच वर्षों में बन जाता है"
गुडएनफ के अनुसार, "व्यक्ति का जितना भी मानसिक विकास होता है,उसका आधा तीन वर्ष में हो जाता है।
स्ट्रंग के अनुसार, "जीवन के प्रथम दो वर्षों में बालक अपने भावी जीवन का शिलान्यास करता है।"
जे. न्यूमैन के अनुसार, "पाँच वर्ष तक की अवस्था शरीर तथा मस्तिष्क के लिए बडी ग्रहणशील रहती है।"
थॉर्नडाईक के अनुसार, "तीन से छः वर्ष तक के बालक प्रायः अर्ध-स्वप्नों की दशा में रहते है।"
वेलेन्टाइन के अनुसार, "शैशवावस्था सीखने का आदर्श काल है।"
वाटसन के अनुसार, "शैशवावस्था में सीखने की सीमा और तीव्रता, विकास की और किसी अवस्था से बहुत अधिक होती है।"
ड्राईडेन के अनुसार, "पहले हम अपनी आदतों का निर्माण करते हैं और फिर हमारी आदतें हमारा निर्माण करती है।"
रूसो के अनुसार, "बालक के हाथ, पैर और नेत्र उसके प्रारम्भिक शिक्षक है। इन्हीं के द्वारा वह पाँच वर्ष में ही पहचान सकता है, सोच सकता है और याद कर सकता है।
क्रो एवं क्रो के अनुसार, "बीसवीं शताब्दी बालक की शताब्दी है।"
ऐडलर के अनुसार, "बालक के जन्म के कुछ माह बाद ही यह निश्चित किया जा सकता है कि जीवन में उसका क्या स्थान है।"
गेसल के अनुसार, "बालक प्रथम 6 वर्षों में बाद के 12 वर्षों का दुगुना सीख लेता है।"
क्रो एवं क्रो के अनुसार, "पाँच वर्ष का शिशु कहानी सुनते समय उससे सम्बन्धित चित्रों को पुस्तक में देखना पसन्द करता है।"
विकास की प्रत्येक अवस्था की अपनी विशेषताएं होती है तथा इन विशेषताओं के आधार पर ही उसकी शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। शैशवावस्था की विशेषताएँ एवं शिक्षा व्यवस्था निम्न तालिका द्वारा स्पष्ट है।

विशेषताएँ
शिक्षा व्यव्स्था
1.शारारिक विकास तीव्रता
2
मानसिक क्षमताओं तीव्रता
3
सीखने में तीव्रता
4
दोहराने की प्रवृत्ति
5. 
जिज्ञासा प्रवृत्ति पर
6. 
दूसरों पर निर्भरता
                       7. स्वप्रेम की भावना
8. 
नैतिक गुणों का अभाव
9. 
काम-प्रवृत्ति
10. 
कल्पना की सजीवता
11. 
संवेगों का प्रदर्शन
12. 
मूल-प्रवृत्तियों पर आधारित व्यवहार
13. 
अनुकरण द्वारा सीखना
14. 
सामाजिक भावना का विकास
1.उपयुक्त वातावरण
2
.स्नेहपूर्ण व्यवहार    जिज्ञासा की संतुष्टि
4
मानसिक क्रियाओं के अवसर
5
निहित गुणों का विकास
6
आत्म-निर्भरता का विकास
7
आत्म-प्रदर्शन का अवसर 8अच्छी आदतों कानिर्माण
विभिन्न अंगों की शिक्षा
10
वास्तविकता का ज्ञान
11
चित्रों एवं कहानियों द्वारा शिक्षा
12
मूल प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन
13
क्रिया द्वारा शिक्षा
14
खेल द्वारा शिक्षा
      


































बाल्यावस्था :

शैशवावस्था की समाप्ति के बाद बाल्यावस्था प्रारंभ होती है। बाल्यावस्था मानव जीवन का वह स्वर्णिम समय है जिसमें उसका सर्वांगीण विकास होता है। बाल्यावस्था व्यक्तित्व निर्माण की अवस्था है। बाल्यावस्था से संबंधित महत्वपूर्ण कथन :
ब्लेयर, जोन्स व सिम्पसन: "शैक्षिक दृष्टिकोण से जीवनचक्र में बाल्यावस्था से महत्वपूर्ण और कोई अवस्था नहीं है।"
कोल एवं ब्रूस ने बाल्यावस्था को जीवन का अनोखा काल बताते हुए कहा है"वास्तव में माता पिता के लिए बाल-विकास की इस अवस्था को समझना कठिन है।"
ब्लेयर, जोन्स और सिम्पसन: "बाल्यावस्था वह काल है जब व्यक्ति के बुनियादी दष्टिकोण. मल्य तथा आदर्श एक बडी सीमा तक निरूपित किये जाते हैं।"
स्टेंग: "ऐसा शायद ही कोई खेल हो, जिसे दस वर्ष के बालक न खेलते हों।" , कोलेस्निक : "बालक को आनन्द प्राप्त करने वाली सरल कहानियों द्वारा नैतिक शिक्षा दी जानी चाहिए।"
कोल एवं ब्रूस: "बाल्यावस्था संवेगात्मक विकास की अनोखी अवस्था होती है।"
स्टेंग के अनुसार, "बालक अपने को अति विशाल संसार में पाता हैं और इसके बारे में जल्दी से जल्दी जानकारी प्राप्त करना चाहता है।"
रॉस के अनुसार, "बाल्यावस्था मिथ्या परिपक्वता का काल है।"
कोल व ब्रूस के अनुसार, "छ: से बारह वर्ष की अवधि की एक अपूर्व विशेषता है—मानसिक रूचियों में स्पष्ट परिवर्तन।"
बाल्यावस्था की प्रमुख विशेषताएं एवं शिक्षा व्यवस्था निम्न प्रकार है।

विशेषता
शिक्षा व्यव्स्था
1. शारीरिक एवं मानसिक विकास में स्थिरता
2. मानसिक योग्यताओं में वृद्धि

3. जिज्ञासा की प्रबलता

4. काम-प्रवृत्ति की न्यूनता

5. वास्तविक जगत से संबंध

6. रचनात्मक कार्यों में आनंद

7. सामुहिक प्रवृति की प्रबलता

8. रुचियों में परिवर्तन

  9. निरुद्देश्य भ्रमण की प्रवृत्ति
10. संग्रह करने की प्रवृत्ति
11. संवेगों का दमन एवं प्रदर्शन

12. नैतिक गुणों का विकास

  13. बर्हिमुखी व्यक्तित्व का विकास

 14. सामाजिक गुणों का विकास
1भाषा के ज्ञान पर बल  2.उपयुक्त विषयों का चयन
3रोचक विषय सामग्री
 4
पाठ्य-विषय एवं शिक्षण विधि में परिवर्तन

 5 जिज्ञासा की संतुष्टि

 6 रचनात्मक कार्यों की व्यवस्था

 7 सामुहिक प्रवृत्ति की संतुष्टि

8  पाठ्यसहगामी क्रियाओं की व्यवस्था9  पर्यटन एवं स्काउटिंग की व्यवस्था
10 संचय प्रवृत्ति को प्रोत्साहन
11 संवेगों के प्रदर्शन का  अवसर  12    नैतिक शिक्षा13   क्रिया एवं खेल द्वारा शिक्षा
14    प्रेम एवं सहानुभूति पर आधारित शिक्षा
      























किशोरावस्था :

किशोरावस्था का अंग्रेजी समानार्थक शब्द Adolescence लैटिन भाषा के शब्द Adolescence (एडोले सियर) से बना ह जिसका अर्थ है—परिपक्वता या प्रजनन क्षमता का विकसित होना।
किशोरावस्था बाल्यावस्था के समाप्त होने पर प्रारंभ होती है और प्रौढ़ावस्था के प्रारंभ में समाप्त हो जाती है। इसे जीवन का बसंत काल भी कहा जाता है। यह विकास की अवस्था बाल्यकाल एवं प्रौढ़ावस्था के मध्य संधिकाल (संक्रमण काल) के नाम से भी जानी जाती है।
किशोरावस्था से सम्बन्धित महत्वपूर्ण कथन :
स्टेनली हॉल के अनुसार "किशोर में जो शारीरिक, मानसिक और संवेगात्मक परिवर्तन होते है वे अकस्मात होते है।"
वेलेन्टाइन के अनुसार, "घनिष्ठ तथा व्यक्तिगत मित्रता उत्तर किशोरावस्था की विशेषता होती है।"
कालस्निक के अनुसार, "किशोर, प्रोढों को अपने मार्ग में बाधा समझता हैं जो उसे अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने से रोकते है।"
ब्लेयर, जोन्स एवं सिम्पसन के अनुसार, "किशारावस्था अत्यक व्यक्ति के जीवन में वह काल है, जो बाल्यावस्था के अंत मआरम्भ होता है और प्रोढावस्था के आरम्भ में समाप्त होता है।"
रॉस के अनुसार, "किशोरावस्था, शैशवावस्था की पुनरावृत्ति काल है।"
रॉस के अनुसार, "किशोर समाज सेवा के आदर्शों का निर्माण और पोषण करता है।"
किलपेट्रिक के अनुसार, "किशोरावस्था जीवन का सबसे कठिन काल है।"
हैडो कमेटी, "ग्यारह या बारह वर्ष की आयु में बालक की नसों में ज्वार उठना आरम्भ हो जाता है, इसे किशोरावस्था के नाम से पुकारा जाता है। यदि इस ज्वार का समय पहले उपयोग कर लिया जाये और इसकी शक्ति तथा धारा के साथ-साथ नई यात्रा आरम्भ कर दी जाये तो सफलता प्राप्त की जा सकती है।"
जरशील्ड के अनुसार, "किशोरावस्था वह समय है, जिसमें विचारशील व्यक्ति बाल्यावस्था से परिपक्वता की ओर संक्रमण करता है।'
क्रो एवं क्रो के अनुसार, “किशोर ही वर्तमान की शक्ति और भावी आशा को प्रस्तुत करता है।"
कुल्हन के अनुसार, "किशोरावस्था बाल्यकाल तथा प्रौढ़ावस्था के मध्य का परिवर्तन काल है।"
किशोरावस्था के विकास के सिद्धांत :
किशोरावस्था में होने वाले विकास के संदर्भ में दो सिद्धांत प्रचलित है1. आकस्मिक विकास का सिद्धांत : इस सिद्धांत का समर्थन स्टेनले हॉल करते हैं। इनके द्वारा लिखित पुस्तक 'एडोले सेंस' में इस सिद्धांत की व्याख्या करते हुए लिखा है कि किशोर में होने वाले परिवर्तन अचानक उत्पन्न होते है, इनका विकास की पूर्ण अवस्थाओं से कोई संबंध नहीं होता है। , 2 क्रमिक विकास का सिद्धांत : इस सिद्धांत के समर्थक किंग, थार्नडाईक और हालिंग वर्थ है। यह सिद्धति कहता है कि किशोर में होने वाले परिवर्तन निरन्तर और क्रमशः होते हैं।
किंग के अनुसार, “जिस प्रकार एक ऋतु का आगमन दसरी ऋत के अंत में होता है, पर जिस प्रकार पहली ऋत में ही दूसरी ऋतु के आगमन के चिन्ह दिखाई देने लगते है उसी प्रकार बाल्यावस्था एव किशोरावस्था एक-दसरे से संबंधित रहती है।"
किशोरावस्था की प्रमुख विशेषताएं एवं शिक्षा व्यवस्था




विशेषता
शिक्षा व्यव्स्था
1. शारीरिक विकास

2. मानसिक विकास

3. व्यवहार में विभिन्नता

4. घनिष्ठ एवं व्यक्तिगत मित्रता
5. स्थिरता एवं समायोजन का अभाव

6. स्वतंत्रता व विद्रोह की भावना 

7. काम-शक्ति की परिपक्वता


8. समूह को महत्व
  9. रुचियों में परिवर्तन एवं स्थिरता

  10. समाज सेवा की भावना

11. वीर-पूजा की भावन

12. अपराध प्रवृत्ति का विकास

13. व्यवसाय चुनाव की चिन्ता


14. ईश्वर एवं धर्म में विश्वास
15. स्थिति एवं महत्व की , अभिलाषा
1शारीरिक विकास के लिए शिक्षा 
2मानसिक विकास के लिए शिक्षा
3 संवेगात्मक विकास के लिए शिक्षा
4  सामाजिक संबंधों के विकास के लिए शिक्षा

5  व्यक्तिगत विभिन्नताओं के अनुसार शिक्षा

6  पूर्व व्यावसायिक शिक्षा

 
7 यौन शिक्षा
8  उपयुक्त शिक्षण विधियों का प्रयोग
9  किशोर-किशोरियों के पृथक पाठ्यक्रम
10  किशोर के प्रति वयस्क का सा व्यवहार
11 जीवन-दर्शन की शिक्षा
12    अपराध प्रवृत्ति पर अंकुश

13   किशोर निर्देशन

14   नैतिक एवं धार्मिक शिक्षा

 15   किशोर के महत्व को मान्यता
      

शारीरिक विकास 

शैशवावस्था

1. भार
नवजात शिश (बालक) का भार 7.15 पौंड तथा बालिका का भार 7.13 पौंड होता है। प्रथम 6माह में भार दुगुना वर्ष के अंत में तीन गुना तथा 5 वर्ष के अंत
में 38-43 पौंड के बीच होता है।
2. ऊँचाई
नवजात शिशु (बालक) की ऊँचाई 20.5 ईंच तथा बालिका की ऊँचाई 20 इंच होती है। प्रथम वर्ष में ऊँचाई 10 ईंच बढ़ती है| लेकिन बाद में धीमी गति से बढ़ती है।
3.सिर एवं मस्तिष्क
नवजात शिशु के सिर की लंबाई | उसकी कुल लंबाई का 25% या भाग होती है। प्रथम दो वर्षों में सिर तेजी से|| बढ़ता है लेकिन फिर मंद गति से बढ़ता है। नवजात शिशु के मस्तिष्क का भार |350gm होता है जो 5 वर्ष में परिपक्व मस्तिष्क के भार का 80% हो जाता है
4.दांतों का विकास
जन्म के छठे मास से दूध के दाँत निकलने शुरू होते हैं। 4 वर्ष की आयु तक दूध के सभी 20 दाँत निकल आते|
5. हड्डियाँ
नवजात शिशु में हड्डियों की संख्या 270 होती है। ये हड्डिया छोटी कोमल तथा लचीली होती है। कैल्शियम, फॉस्फोरसतथा अन्य खजिन लवणों से यह कठोर एवं मजबूत होती है। इसे अस्थायीकरण या अस्थि निर्माण कहा जाता है।
6.अन्य अंग
नवजात शिशु की मांसपेशियों का भार । शरीर के कुल भार का 23% होता है। नवजात शिशु की हृदय की धड़कन 11 मिनट में 140 बार होती है। प्रथम दो वर्षों में टांगे डेढ़ मुनी और भुजाएं दो गुनी हो जाती है।


बाल्यावस्था

1. भार
बालक एवं बालिका के भार में वृद्धि होती है तथा बाल्यावस्था के अंत में भाग 80-95 पौंड के मध्य हो जाता है। 10, वर्ष तक बालक का भार ज्यादा होता है। लेकिन 11वें एवं 12वें वर्ष में बालिका का भार बालक से ज्यादा होता है।

2. ऊँचाई
बाल्यावस्था के दौरान लंबाई/ऊँचाई
बहुत धीमी गति से बढ़ती है। इस है अवस्था में लंबाई में कुल वृद्धि 10-12 इंच की ही होती है।
3.सिर एवं मस्तिष्क
सिर के आकार में परिवर्तन जारी रहता ग है। 5 वर्ष में सिर का आकार प्रौढ़ सिर से के आकार कार 90% तथा 10 वर्ष में ना 95% हो जाता है। मस्तिक के भार में र भी वृद्धि होती है तथा 9 वर्ष में यह व परिपक्व मस्तिष्क के भार का 90% हो जाता है।
4.दांतों का विकास
छठे वर्ष से दूध के दाँत गिरने लगते है।  तथा स्थायी दाँत आने लगते हैं। 11- 12 वर्ष तक स्थाई दाँत आ जाते हैं।
5. हड्डियाँ
बाल्यावस्था में हड्डियो की संख्या  270 से बढ़ कर 350 हो जाती है।
अस्थिकरण की प्रक्रिया बालकों की र तुलना में बालिकाओं में तीव्र होती है।
6.अन्य अंग
9 वर्ष में मांसपेशियों का भार कुल भार का 27% एवं 12 वर्ष में 33% हो जाता है। हृदय की धड़कन 6वर्ष में 100 बार तथा 12 वर्ष में 85 बार हो जाती है। इस अवस्था में यौनांगो का विकास भी तेजी से होता है।




किशोरावस्था

1. भार
किशोर-किशोरीयों का भार तेजी से बढ़ता है तथा किशोरावस्था में दोनों के भार में अंतर लगभग 25 पौंड का होता है। अर्थात किशोर का भार किशोरी से 25 पौंड अधिक होता है।
2. ऊँचाई
किशोर-किशोरीयों दोनों की ऊँचाई में वृद्धि होती है। किशोरीयाँ अपनी अधिकतम ऊँचाई 16 वर्ष तक प्राप्त कर लेती है| जबकिकिशोर 18 वर्षकेबाद भी बढ़ते हैं।
3.सिर एवं मस्तिष्क
15-16वर्ष की आयु तक सिर का लगभग पूर्ण विकास हो जाता है। मस्तिष्क का भार भी बढ़ कर 1200-1400 ग्राम हो जाता है।
4.दांतों का विकास
इस अवस्था में दाँतों की संख्या |28होती है। यदि प्रज्ञा दाँत आने होते है तो ये किशोरावस्था के अंत में या प्रौढ़ावस्था के प्रारंभ में आ जाते हैं।
5. हड्डियाँ
किशोरावस्था में अस्थि करण की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है तथा कई| छोटी-छोटी हड्डिया आपस में जुड़ जाती है जिससे हड्डियों की संख्या 206हो जाती है।
6.अन्य अंग
16वर्ष में मांसपेशियों का भार शरीर के कुल भार का 44% हो जाता है। तथा हृदय की धड़कन 1 मिनट में 72 हो जाती है। बालक में स्वप्न दोष एवं' बालिका में मासिक धर्म आरंभ हो जाता है।

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