Israel–US–Iran-conflict मध्य-पूर्व की जटिल राजनीति: इज़रायल-अमेरिका-ईरान विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कारण तथा विश्व शक्ति संतुलन Jagriti PathJagriti Path

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Monday, March 2, 2026

Israel–US–Iran-conflict मध्य-पूर्व की जटिल राजनीति: इज़रायल-अमेरिका-ईरान विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कारण तथा विश्व शक्ति संतुलन

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मध्य पूर्व में अमेरिका के हस्तक्षेप के कारण और लक्ष्य 


अमेरिका अपनी विश्व शक्ति को बरकरार रखने के लिए तथा तेल, सुरक्षा, क्षेत्रीय प्रभाव, और वैश्विक शक्ति संतुलन के लिए जानबूझकर ऐसा करता है। अमेरिका मध्य पूर्व में अपना दबदबा कायम रख कर आर्थिक हित पूरा करने तथा अपने सहेते इजरायल की सुरक्षा हेतु सीधा मुस्लिम देशों पर अपनी शक्ति के बलबूते हमले करवाता है। इजरायल का होना हमेशा अमेरिका की वज़ह से ही सम्भव हो पाया है क्योंकि ईसाई लोग यहुदी लोगों के अच्छे क़रीबी मानते हैं दूसरी तरफ यह लोग बहुत प्रतिभाशाली भी होते हैं।
अगर चीन और रूस ने अपने महाशक्ति प्रतिस्पर्धा में मुस्लिम देशों को खुला सहयोग दिया तो स्थिति भयावह हो जाएगी। हालांकि अप्रत्यक्ष रूप से कुछ देश इन मुस्लिम देशों को सहयोग देते हैं लेकिन अमेरिका ने पहले से अधिकांश मुस्लिम देशों की सरजमीं पर आर्थिक कुटनीति तरीके से समझौता करके पहले से उनको मूर्ख बनाकर जगह जगह पर अपने सैन्य अड्डे विकसित कर लिए हैं इसलिए अब किसी भी उभरते हुए मुस्लिम देश के लिए अमेरिका और इजरायल को चुनौती देना बहुत मुश्किल होगा। अमरीका इजरायल को कंधे के रूप में उपयोग करता है लेकिन इस मामले में दोहरा फायदा हैं: अमेरिका का शक्ति संतुलन और इजरायल का अस्तित्व बने रहना । इसलिए हमलों की पहल हमेशा इजरायल ही करता आया है। 
लेकिन चीन और रूस को इस खींचातान में बहुत फायदा होगा ईरान की जवाबी कार्रवाई तथा अन्य किसी मुस्लिम देश के सहयोग से अगर यह देश अमेरिका से लोहा लेते हैं तो अमेरिका आर्थिक तथा हथियारों के खर्चे में जरूर पीछे हो जाएगा।

तृतीय विश्व युद्ध की बात करें तो यह संभव नहीं है क्योंकि कि रूस और चीन जो अपने महाशक्ति मिशन में कोई डिस्टर्ब नहीं चाहेंगे वो भी मुस्लिम देशों के लिए जो सामरिक दृष्टि से अमेरिका के समीप है। इसलिए गुप्त रूप से मुस्लिम लोगों की लाशों पर अमेरिका अपने महाशक्ति रूप को बरकरार रखने की कोशिश करेगा जो वह लम्बे समय से करता आ रहा है। मुस्लिम देशों की क्या लाचारी रही है कि वे तेल भी देते हैं लेकिन वह अपनी मनमर्जी से हथियार भी नहीं बना सकते? इसका मतलब है आप किसी महाशक्ति के बगल में रहकर कभी अपने संसाधनों पर स्वतंत्र नहीं रह सकते हैं। इसलिए आगे शक्ति संतुलन तथा मुस्लिम देशों के आंतरिक संघर्ष और अस्थिरता के बारे में समझिए।

मध्य पूर्व में मुस्लिम देशों का धार्मिक कट्टरवाद आपसी फूट और संघर्ष से पिछड़ापन 


मुस्लिम देशों की एकता नहीं है अगर वे एक हो जाएं तो अमेरिका को बहुत कमजोर कर सकते हैं। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है बहुत से मुस्लिम देशों पर अमेरिका ने पहले से दबदबा बनाकर वहां सैन्य अड्डे बना लिए हैं तथा उन देशों को आर्थिक और कूटनीतिक रूप से अपने कब्जे में ले लिया है। अब केवल ईरान और वेनेज़ुएला थे जो अमेरिका को तेल के मामले में दादागिरी का जबाब देते थे लेकिन अब अमेरिका ईरान को मुस्लिम देशों के सहयोग और इजरायल की धरती का उपयोग कर ईरान पर हमले कर रहा है। इजरायल के सहयोग में अमेरिका का मुद्दा धार्मिक और इस्लामोफोबिया से जुडा हो सकता है क्योंकि जो देश इजरायल को नहीं चाहते वे अमेरिका के दुश्मन माने जाते थे लेकिन अमेरिका में कूटनीतिक का प्रयोग करते हुए इजरायल के मुस्लिम दुश्मन देशों को येन-केन प्रकारेण अपनी शक्ति बनाए रखने के लिए अपने और इजरायल के सामने शांत करवा दिया।
इसलिए मध्य एशिया में कोई भी मुस्लिम देश वास्तविक संप्रभु नहीं है । अमेरिका ने जानबूझकर पाकिस्तान के अलावा किसी मुस्लिम देश को परमाणु हथियार बनाने नहीं दे रहा है। अमेरिका जानता है अगर मध्य एशिया में कोई मुस्लिम देश परमाणु हथियार बनाकर एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उदय हुआ तो वह मुस्लिम देशों का नेतृत्व कर अमेरिका के लिए ऊर्जा स्रोतों के लिए खतरा बन सकता है। अमेरिका विश्व में महाशक्तियों की होड़ में डरा हुआ हमेशा अपने हथियारों के दम पर इन ऊर्जा के विशाल स्रोतों वाले मुस्लिम देशों पर कूटनीतिक तथा आर्थिक लोभ तथा आपसी फूट का सहारा लेकर हर बार हथियारों का उपयोग कर उन्हें डराएं रखता है। यह मुस्लिम देशों की सबसे शर्मनाक स्थिति है कि एकता नहीं होने पर तथा अन्य देशों के साथ अच्छे संबंधों के बिना किसी महाशक्ति को चुनौती देना कितना ख़तरनाक होता है।
अमेरिका की इस नीति से चीन और रूस को बुरा लगता है क्योंकि महाशक्तियों की दौड़ में अमेरिका इन देशों की बराबरी बनाए रखने के लिए मध्य एशिया के इन तेल और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थानों पर कब्जा बनाए रखना चाहता हैं। 
जिस दिन ईरान परमाणु शक्ति बन कर क्षेत्रीय शक्ति के रूप में सामने आएगा तब मुस्लिम देशों की स्थति बदल जाएगी। लेकिन पाकिस्तान और तुर्की का नेतृत्व की लालसा में आपसी फुट को बढ़ावा देने भी इन देशों के संगठनात्मक ढांचे के लिए हमेशा निराशाजनक रहा है। भौतिकवाद और पूंजीवाद के लालच में धार्मिक कट्टरवाद के चलते आपसी फूट से अधिकांश देशों को अमेरिका ने ग़ुलाम बना दिया हालांकि अमेरिका की इनसे कोई हमदर्दी नहीं केवल ऊर्जा के स्त्रोतों को खोखला कर छोड़ना ही लक्ष्य है।
मुस्लिम देशों को इसका खामियाजा लम्बे समय बाद भुगतना पड़ेगा कि धर्म से ज्यादा आधुनिक युग की तकनीक और नवीन शिक्षा और जागरूकता कितनी जरूरी है। 

मुस्लिम देशों के पास परमाणु हथियार क्यों नहीं? विश्व शक्ति संतुलन की अवधारणा 


मध्य पूर्व (Middle East) और अन्य मुस्लिम-बहुल देशों के संदर्भ में यह प्रश्न अक्सर उठता है कि तेल जैसी अपार संपदा होने के बावजूद अधिकांश देशों के पास परमाणु हथियार क्यों नहीं हैं। इसका उत्तर केवल “धर्म” या “एक देश” में नहीं, बल्कि भू-राजनीति (Geopolitics), अर्थव्यवस्था, आंतरिक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के जटिल संतुलन में छिपा है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि परमाणु हथियार बनाना केवल धन का प्रश्न नहीं है। इसके लिए दशकों की वैज्ञानिक तैयारी, स्थिर राजनीतिक व्यवस्था, उच्च स्तरीय तकनीकी संस्थान और गोपनीय रक्षा संरचना चाहिए। तेल संपन्न देश जैसे Saudi Arabia या United Arab Emirates के पास धन तो है, पर उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक तेल निर्यात पर केंद्रित रखा। वैज्ञानिक-औद्योगिक आधार उतना विकसित नहीं हुआ जितना परमाणु हथियार कार्यक्रम के लिए आवश्यक होता है।
दूसरा बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार संधि (NPT) है। अधिकांश मुस्लिम देश इस संधि के हस्ताक्षरकर्ता हैं, जिससे वे परमाणु हथियार विकसित करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं। केवल Pakistan ऐसा मुस्लिम-बहुल देश है जिसने 1998 में परमाणु परीक्षण किया और आज उसके पास परमाणु हथियार हैं।
जब Iran ने अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाया, तो अमेरिका और पश्चिमी देशों ने उस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए। यह दर्शाता है कि परमाणु हथियार विकास के प्रयासों पर वैश्विक शक्तियां सक्रिय रूप से प्रतिक्रिया देती हैं।
अब प्रश्न आता है—अमेरिका की भूमिका क्या है?
United States की मध्य पूर्व में तीन प्रमुख रणनीतिक प्राथमिकताएं रही हैं:
•तेल आपूर्ति की स्थिरता
•अपने सहयोगियों की सुरक्षा
•क्षेत्र में परमाणु प्रसार को रोकना
अमेरिका ने कई देशों के साथ रक्षा समझौते किए हैं, जिससे वे अमेरिकी “सुरक्षा छाता” (security umbrella) के अंतर्गत आते हैं। उदाहरण के लिए, Saudi Arabia और अन्य खाड़ी देशों को अमेरिकी सैन्य सुरक्षा का भरोसा है, इसलिए वे स्वयं परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में खुलकर नहीं बढ़ते।
इसके अलावा, मध्य पूर्व में बार-बार युद्ध और अस्थिरता भी विकास में बाधा बने हैं—जैसे Iraq युद्ध, Syria का गृहयुद्ध, और Yemen का संकट। लगातार संघर्ष संसाधनों को शिक्षा, अनुसंधान और औद्योगिक विकास से हटाकर सैन्य और पुनर्निर्माण में लगा देते हैं।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि विकास को केवल “बाहरी शक्तियां बाधित करती हैं” ऐसा कहना पूर्ण सत्य नहीं होगा। कई देशों में,आंतरिक भ्रष्टाचार,सत्तावादी शासन,लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी,शिक्षा और नवाचार में निवेश की कमी जैसे कारण भी दीर्घकालिक विकास में बाधा डालते हैं।
अंततः मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन (Power Balance) का खेल बहुत जटिल है। क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता (जैसे ईरान बनाम खाड़ी देश), वैश्विक महाशक्तियों का प्रभाव, और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध—ये सभी मिलकर परमाणु हथियार प्रसार को सीमित रखते हैं।


विश्व शक्ति संतुलन (Global Power Balance) के दृष्टिकोण 

मध्य पूर्व में तय होता है विश्व शक्ति संतुलन इसलिए यह क्षेत्र वैश्विक राजनीतिक का बड़ा मंच है।

अमेरिका की रणनीति और शक्ति संतुलन


United States की नीति लंबे समय से यह रही है कि मध्य पूर्व में कोई एक देश इतना शक्तिशाली न हो जाए कि वह पूरे क्षेत्र पर प्रभुत्व जमा ले।
यदि किसी देश के पास परमाणु हथियार आ जाएं, तो वह क्षेत्रीय संतुलन बदल सकता है। इसी कारण जब Iran ने परमाणु कार्यक्रम आगे बढ़ाया, तो अमेरिका और पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाए।
अमेरिका अपने सहयोगी देशों जैसे Saudi Arabia को सुरक्षा आश्वासन देता है। इससे वे स्वयं परमाणु हथियार विकसित करने की आवश्यकता कम महसूस करते हैं। इसे “सुरक्षा छाता” (Security Umbrella) कहा जाता है।

क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता


मध्य पूर्व में शक्ति संघर्ष पहले से मौजूद है—
•ईरान बनाम खाड़ी देश
•सुन्नी बनाम शिया प्रभाव
•अरब राष्ट्रवाद बनाम अन्य क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं
यदि एक देश परमाणु शक्ति बनता है, तो अन्य देश भी हथियारों की दौड़ (Arms Race) में उतर सकते हैं। इससे पूरा क्षेत्र अस्थिर हो सकता है।

अन्य महाशक्तियों की भूमिका


Russia और China भी मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ा रहे हैं।
वे अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती देना चाहते हैं, लेकिन वे भी खुले परमाणु प्रसार के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि इससे वैश्विक अस्थिरता बढ़ेगी।

तेल बनाम तकनीकी विकास


तेल संपन्नता ने कई देशों को आर्थिक रूप से समृद्ध किया, परंतु दीर्घकालीन वैज्ञानिक और औद्योगिक आधार उतना विकसित नहीं हो पाया जितना परमाणु हथियार कार्यक्रम के लिए चाहिए।
परमाणु शक्ति केवल धन से नहीं, बल्कि दशकों की तकनीकी तैयारी से बनती है।

शक्ति संतुलन किस ओर झुकता है?


वर्तमान में मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन ऐसा रखा गया है कि कोई नया परमाणु देश न उभरेअमेरिका और उसके सहयोगी प्रभाव बनाए रखें,रूस और चीन संतुलन की राजनीति करें,इसलिए अधिकांश मुस्लिम-बहुल देशों के पास परमाणु हथियार नहीं हैं। यह धर्म तथा आपसी फूट के साथ साथ, आत्मनिर्भरता की कमी, वैश्विक रणनीति, क्षेत्रीय संतुलन, लगातार छोटे युद्धों में उलझे रहना, भौतिकवाद और पूंजीवाद के वर्चस्व और अंतरराष्ट्रीय दबाव के परिणामस्वरूप है कि आज पाकिस्तान को छोड़कर कोई मुस्लिम देश परमाणु हथियार संपन्न नहीं है जो अमेरिका को हस्तक्षेप करने में चुनौती दे सकें। 

इज़रायल, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव की पृष्ठभूमि और इतिहास 


इज़रायल, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कोई अचानक उत्पन्न हुई घटना नहीं है, बल्कि यह दशकों से विकसित हो रही राजनीतिक, वैचारिक, धार्मिक और सामरिक प्रतिद्वंद्विता का परिणाम है। इस त्रिकोणीय संबंध को समझने के लिए 20वीं सदी के मध्य से शुरू होने वाली घटनाओं पर नज़र डालना आवश्यक है।
1948 में Israel की स्थापना के बाद मध्य-पूर्व की राजनीति पूरी तरह बदल गई। कई अरब देशों ने इस नए यहूदी राष्ट्र को स्वीकार नहीं किया। यद्यपि Iran उस समय औपचारिक रूप से इज़रायल का खुला विरोध नहीं कर रहा था, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति में अरब-इज़रायल संघर्ष की गूंज हर जगह थी। उस समय ईरान पर शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का शासन था, जो पश्चिमी देशों, विशेषकर United States के करीबी सहयोगी थे।

1953 का तख्तापलट और अमेरिका-ईरान संबंध


1953 में ईरान में लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक को हटाने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन की खुफिया एजेंसियों ने मिलकर ऑपरेशन अंजाम दिया। इस घटना ने ईरान की राजनीति में अमेरिका के हस्तक्षेप की गहरी छाप छोड़ी। शाह का शासन अमेरिका समर्थक था और उसने पश्चिमी नीतियों को अपनाया। इसी दौर में ईरान और इज़रायल के बीच गुप्त सहयोग भी बना रहा, क्योंकि दोनों को अरब राष्ट्रवाद से चुनौती मिल रही थी।

1979 की इस्लामी क्रांति: निर्णायक मोड़


1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई, जिसका नेतृत्व Ruhollah Khomeini ने किया। शाह को सत्ता से हटाकर ईरान को इस्लामी गणराज्य घोषित किया गया। इस क्रांति के बाद ईरान की विदेश नीति में बड़ा परिवर्तन आया। अमेरिका को “महाशैतान” और इज़रायल को “ग़ैर-वैध राज्य” घोषित किया गया।
इसी वर्ष तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर 52 अमेरिकी नागरिकों को बंधक बना लिया गया। यह घटना अमेरिका-ईरान संबंधों में स्थायी दरार का कारण बनी। इसके बाद अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध लगभग समाप्त हो गए।

लेबनान, हिज़्बुल्लाह और क्षेत्रीय संघर्ष


1980 और 1990 के दशक में ईरान ने लेबनान में शिया संगठन हिज़्बुल्लाह को समर्थन देना शुरू किया। इज़रायल इसे अपनी सुरक्षा के लिए सीधा खतरा मानता है। इज़रायल और हिज़्बुल्लाह के बीच कई बार संघर्ष हुआ, विशेषकर 2006 का युद्ध उल्लेखनीय है। अमेरिका, इज़रायल का सबसे बड़ा समर्थक होने के कारण, ईरान के इस क्षेत्रीय प्रभाव को रोकने की कोशिश करता रहा।

परमाणु कार्यक्रम और बढ़ता तनाव


2000 के दशक में ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने विवाद को और गहरा कर दिया। इज़रायल का आरोप है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान कहता है कि उसका कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण ऊर्जा उत्पादन के लिए है।
2015 में ईरान और विश्व शक्तियों के बीच परमाणु समझौता हुआ, जिसे JCPOA कहा गया। इस समझौते में ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने पर सहमति दी, बदले में प्रतिबंधों में राहत मिली। लेकिन 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने इस समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया और दोबारा कड़े प्रतिबंध लगा दिए। इससे तनाव फिर बढ़ गया।

सीरिया और प्रॉक्सी युद्ध


सीरिया के गृहयुद्ध में ईरान ने राष्ट्रपति बशर अल-असद का समर्थन किया, जबकि इज़रायल ने ईरानी सैन्य ठिकानों पर कई हवाई हमले किए। यह प्रत्यक्ष युद्ध नहीं, बल्कि “प्रॉक्सी वॉर” का रूप था। अमेरिका ने भी सीरिया में हस्तक्षेप किया, जिससे क्षेत्रीय समीकरण और जटिल हो गए।

2020: क़ासिम सुलेमानी की हत्या


जनवरी 2020 में अमेरिका ने ईरान के शीर्ष सैन्य कमांडर Qasem Soleimani को इराक में ड्रोन हमले में मार गिराया। यह घटना तनाव का चरम बिंदु थी। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इराक में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं। हालाँकि पूर्ण युद्ध नहीं हुआ, लेकिन स्थिति अत्यंत संवेदनशील हो गई।

हालिया घटनाक्रम और गाज़ा संकट


2023-24 में गाज़ा में इज़रायल और हमास के बीच संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को फिर अस्थिर कर दिया। ईरान हमास और हिज़्बुल्लाह का समर्थन करता है, जबकि अमेरिका खुलकर इज़रायल के साथ खड़ा है। कई बार ऐसी स्थिति बनी जब सीधा टकराव होने की आशंका जताई गई।

विवाद के मूल कारण

वैचारिक विरोध – ईरान का इस्लामी शासन इज़रायल को मान्यता नहीं देता।
क्षेत्रीय वर्चस्व – मध्य-पूर्व में प्रभाव बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा।
परमाणु कार्यक्रम – इज़रायल और अमेरिका को सुरक्षा खतरे की आशंका।
प्रॉक्सी समूह – हिज़्बुल्लाह, हमास जैसे संगठनों के माध्यम से अप्रत्यक्ष संघर्ष।
अमेरिकी प्रतिबंध – आर्थिक दबाव और राजनीतिक अलगाव।

इज़रायल, अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष केवल सैन्य टकराव का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह विचारधारा, सुरक्षा, ऊर्जा संसाधनों और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से जुड़ा जटिल प्रश्न है। प्रत्यक्ष युद्ध अभी तक टला है, लेकिन प्रॉक्सी संघर्ष और कूटनीतिक टकराव जारी हैं। भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या कूटनीति, वार्ता और संतुलित नीति से तनाव कम किया जा सकता है या नहीं।


इज़रायल-ईरान टकराव की ताज़ा पृष्ठभूमि और युद्ध जैसी स्थिति 2023 के बाद से


 मध्य-पूर्व में तनाव कई गुना बढ़ा। गाज़ा संघर्ष के दौरान Iran समर्थित समूहों—हमास, हिज़्बुल्लाह और इराक-सीरिया में शिया मिलिशिया—ने Israel के विरुद्ध मोर्चा तेज किया। इसके जवाब में इज़रायल ने सीरिया और लेबनान में ईरानी ठिकानों पर हवाई हमले बढ़ाए।
अप्रैल 2024 में स्थिति तब और गंभीर हो गई जब ईरान ने पहली बार सीधे इज़रायल की ओर ड्रोन और मिसाइलें दागीं। अधिकांश हमले इज़रायल और उसके सहयोगियों की एयर डिफेंस प्रणाली ने रोक दिए, लेकिन इससे यह स्पष्ट हो गया कि अब संघर्ष केवल “प्रॉक्सी वॉर” तक सीमित नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम में United States ने इज़रायल को सैन्य और कूटनीतिक समर्थन दिया। अमेरिकी नौसैनिक जहाज़ों और वायु रक्षा प्रणालियों ने भी क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाई।

अमेरिका के लक्ष्य और रणनीतिक हित


अमेरिका की भूमिका को केवल इज़रायल-समर्थन तक सीमित समझना अधूरा होगा। उसके व्यापक लक्ष्य निम्नलिखित हैं:
इज़रायल की सुरक्षा सुनिश्चित करना – अमेरिका दशकों से इज़रायल को अपना प्रमुख रणनीतिक सहयोगी मानता है।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना – वॉशिंगटन को आशंका है कि ईरान परमाणु हथियार क्षमता की ओर बढ़ सकता है।
मध्य-पूर्व में शक्ति संतुलन बनाए रखना – खाड़ी क्षेत्र में तेल आपूर्ति और समुद्री मार्ग (जैसे होरमुज़ जलडमरूमध्य) की सुरक्षा अमेरिकी आर्थिक हितों से जुड़ी है।
चीन और रूस के प्रभाव को सीमित करना – अमेरिका नहीं चाहता कि ईरान पूरी तरह रूस-चीन धुरी में चला जाए।
अमेरिका सीधे बड़े युद्ध से बचना चाहता है, क्योंकि इराक और अफगानिस्तान के अनुभवों ने दिखाया है कि लंबा युद्ध महंगा और राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है। इसलिए वह “डिटरेंस” यानी प्रतिरोधक शक्ति की नीति अपनाता है—सख्त चेतावनी, प्रतिबंध और सीमित सैन्य कार्रवाई।

अन्य देशों का पक्ष और विपक्ष


सऊदी अरब और यूएई: ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव से चिंतित रहते हैं, पर हाल के वर्षों में उन्होंने तेहरान से संबंध सुधारने की कोशिश भी की है। वे खुला युद्ध नहीं चाहते।
कतर और तुर्की: गाज़ा मुद्दे पर इज़रायल की आलोचना करते हैं, पर सीधे ईरान-अमेरिका टकराव में संतुलन बनाए रखते हैं।
रूस: सीरिया में ईरान का सहयोगी है और अमेरिका के प्रभाव को चुनौती देने के लिए तेहरान के साथ सामरिक संबंध बनाए रखता है।
चीन: ईरान के साथ ऊर्जा और व्यापारिक संबंध मजबूत कर रहा है, पर वह भी क्षेत्रीय स्थिरता चाहता है ताकि तेल आपूर्ति बाधित न हो।
यूरोपीय संघ: परमाणु समझौते (JCPOA) को पुनर्जीवित करने की कोशिश करता रहा है और खुला युद्ध रोकने के पक्ष में है।

भारत की भूमिका और संतुलन नीति


India की स्थिति इस पूरे विवाद में अत्यंत संतुलित रही है। भारत के तीन प्रमुख हित हैं: 
ऊर्जा सुरक्षा – भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है।
प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा – लाखों भारतीय नागरिक खाड़ी देशों और इज़रायल में काम करते हैं।
रणनीतिक साझेदारी – भारत के इज़रायल और अमेरिका दोनों से मजबूत रक्षा संबंध हैं, वहीं ईरान के साथ चाबहार पोर्ट और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाएं जुड़ी हैं।
भारत ने हमेशा तनाव कम करने, संवाद और कूटनीतिक समाधान का समर्थन किया है। उसने न तो खुले तौर पर ईरान का पक्ष लिया, न ही किसी सैन्य कार्रवाई में शामिल हुआ। भारत की विदेश नीति “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित है—जहाँ वह सभी पक्षों से संबंध बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है।
वैसे भारत की बात करें तो इस पूरे मामले में भारत कहीं भी रहें कोई मायने नहीं रखता है क्योंकि लड़ाई अमेरिका के वर्चस्व की है जो रूस और चीन की प्रगति के दरम्यान उत्पन्न हुई है। भारत के लिए कोई खतरा नहीं है क्योंकि भारत उभरती हुई जनसंख्या तथा वैश्विक बड़ा बाजार है जहां चीन रूस और अमेरिका प्रतिस्पर्धा के साथ भारत से व्यवहारिकता बनाएं रखना चाहते हैं जिसकी भारत को भी जरूरत है। 

मध्य-पूर्व की व्यापक शक्ति राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक संतुलन का प्रश्न


इज़रायल-ईरान-अमेरिका विवाद केवल दो देशों के बीच का संघर्ष नहीं, बल्कि यह मध्य-पूर्व की व्यापक शक्ति राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक संतुलन का प्रश्न है। अमेरिका इज़रायल की सुरक्षा और अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करना चाहता है, ईरान क्षेत्रीय प्रभाव और प्रतिरोध की नीति पर चलता है, जबकि अन्य देश खुला युद्ध टालने की कोशिश में संतुलन साध रहे हैं।
भारत जैसे देश इस पूरे घटनाक्रम में शांति, स्थिरता और संतुलन की भूमिका निभाते हुए अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों की रक्षा पर केंद्रित हैं। भविष्य की दिशा काफी हद तक कूटनीतिक वार्ताओं, क्षेत्रीय समझौतों और महाशक्तियों की नीति पर निर्भर करेगी।

युद्ध के संभावित परिणाम और बदलता विश्व शक्ति संतुलन


2025–2026 में इज़रायल, ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े प्रत्यक्ष टकराव ने केवल मध्य-पूर्व को ही नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित किया है। यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है या फिर बड़े पैमाने के युद्ध में बदलता है, तो इसके परिणाम बहुआयामी होंगे—सैन्य, आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर।
सबसे पहला प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। खाड़ी क्षेत्र दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण केंद्र है। यदि होरमुज़ जलडमरूमध्य या अन्य समुद्री मार्ग बाधित होते हैं, तो तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल आएगा। इससे एशिया, यूरोप और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाएँ दबाव में आ सकती हैं। महंगाई बढ़ेगी, वैश्विक व्यापार धीमा होगा और आर्थिक अस्थिरता बढ़ सकती है।
दूसरा बड़ा परिणाम सैन्य संतुलन में बदलाव के रूप में सामने आएगा। United States अब भी दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है और Israel उसका करीबी सहयोगी है। यदि अमेरिका खुलकर और गहराई से युद्ध में शामिल होता है, तो शुरुआती सैन्य बढ़त उसके पक्ष में रहेगी। लेकिन Iran की रणनीति पारंपरिक युद्ध से अधिक “असमान युद्ध” (asymmetric warfare) पर आधारित है—ड्रोन, मिसाइलें, साइबर हमले और प्रॉक्सी समूहों के माध्यम से। इससे युद्ध लंबा और जटिल हो सकता है।
तीसरा आयाम वैश्विक शक्ति संतुलन का है। यदि अमेरिका निर्णायक सैन्य सफलता हासिल करता है और ईरान की क्षमताएँ गंभीर रूप से कमजोर होती हैं, तो अल्पकाल में शक्ति संतुलन पश्चिमी धुरी की ओर झुक सकता है। इससे अमेरिका की पारंपरिक नेतृत्व भूमिका फिर मजबूत दिखाई दे सकती है।
लेकिन यदि युद्ध लंबा चलता है, अमेरिकी संसाधन और जनमत थकान महसूस करते हैं, और रूस-चीन अप्रत्यक्ष रूप से ईरान को आर्थिक या कूटनीतिक समर्थन देते हैं, तो विश्व व्यवस्था और अधिक बहुध्रुवीय (multipolar) दिशा में जा सकती है। China और Russia पहले ही पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे परिदृश्य में यह संघर्ष अमेरिकी प्रभुत्व को कमजोर कर सकता है और एशियाई शक्तियों को अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली बना सकता है।
चौथा महत्वपूर्ण परिणाम परमाणु प्रसार से जुड़ा है। यदि ईरान को लगता है कि उसकी सुरक्षा खतरे में है, तो वह परमाणु हथियार क्षमता की ओर तेज़ी से बढ़ सकता है। इससे सऊदी अरब जैसे देश भी परमाणु विकल्प पर विचार कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में मध्य-पूर्व परमाणु प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन सकता है, जो वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा होगा।
अंततः विश्व शक्ति संतुलन किस ओर झुकेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि युद्ध सीमित रहता है या व्यापक बनता है। अल्पकाल में सैन्य और तकनीकी श्रेष्ठता के कारण झुकाव अमेरिका-इज़रायल की ओर दिख सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यदि संघर्ष से आर्थिक थकावट और राजनीतिक असंतोष बढ़ता है, तो बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और मजबूत हो सकती है, जिसमें चीन और रूस का प्रभाव बढ़ेगा।
इस प्रकार यह युद्ध केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि 21वीं सदी के शक्ति समीकरणों को परिभाषित करने वाला मोड़ साबित हो सकता है।


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13 जून 2025 — मिसाइलों का बड़ा आक्रमण

ईरान ने इज़रायल पर बड़े पैमाने पर बैलिस्टिक मिसा
इल और ड्रोन हमले शुरू किए, जिसमें दर्जनों मिसाइलें दागी गईं और कई शहरों में घायल व जान-माल की हानि हुई। यह हमला ऑपरेशन राइजिंग लायन के बाद हुआ था, जिसमें इज़रायली और संयुक्त रूप से अमेरिकी ताकतों ने ईरान के परमाणु व सैन्य ठिकानों पर वायु हमले किए थे। 
22-24 जून 2025 — 12-दिवसीय युद्ध और युद्ध विराम
स्ट्राइक और काउंटर-स्ट्राइक का सिलसिला करीब 12 दिनों तक चला, जिसे “Twelve-Day War” कहा गया। अंततः 24 जून 2025 को अमेरिका और कतर के मध्यस्थता प्रयासों से युद्ध विराम लागू हुआ, लेकिन क्षेत्रीय तनाव वहीं बरकरार रहा। 
इरान का प्रतिशोध 
युद्ध के दौरान ईरान ने कतर में मौजूद अल उदैद एयर बेस पर मिसाइल हमले किए, जो अमेरिकी सैन्य ठिकानों में गिना जाता है। इससे खाड़ी-क्षेत्र के कई देशों ने अपना एयरस्पेस बन्द कर दिया। 

2026: संघर्ष का फिर बिगड़ना और बड़ा सैन्य मोड़


28 फरवरी 2026 — संयुक्त अमेरिकी-इज़रायली हमला
28 फरवरी की सुबह सहमति से United States और Israel ने बड़े पैमाने पर Operation Lion’s Roar / Epic Fury नामक संयुक्त सैन्य अभियान शुरू किया और ईरान के कई सैन्य/राजनीतिक लक्ष्य पर हमले किए। इस हमले के लक्ष्य ईरान की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करने और उसके नेतृत्व को निशाना बनाने थे। 

ईरान का प्रतिशोध और पलटवार

ईरान ने अमेरिका और इज़रायल के खिलाफ जवाबी मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिनमें क्षेत्र के अमेरिकी ठिकानों और इज़राइल की ओर मिसाइलें भेजी गईं। ईरान ने स्पष्ट कर दिया कि तक तक “आत्मरक्षा” जारी रखेगा जब तक आक्रमण बंद नहीं होता। 
सुप्रीम लीडर की मौत का दावा और बड़ी जवाबी कार्रवाई
कुछ रिपोर्टों में यह बताया गया कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातोल्लाह अली खामेनेई की संयुक्त हमलों में हत्या कर दी गई, जिससे इज़रायल-यूएस संघर्ष और भी तेज़ हो गया। 

लेबनान में संघर्ष का फैलाव


ईरान-समर्थित संगठन हिज़्बुल्लाह ने लेबनान से इज़रायल पर मिसाइलें दागीं, जिसका जवाब इज़रायली वायु सेना ने लेबनान में हिज़्बुल्लाह की स्थिति पर एयरस्ट्राइक कर दिया। इससे संघर्ष का इलाका और विस्तृत रूप लेने लगा। 

खामनेई का संघर्ष और इस्लामिक राष्ट्र की भावना 


खामनेई ने ईरान को बचाने की भरसक कोशिश की लेकिन उनके अपने देश पहले से अमेरिका के चंगुल में फंसकर उनके लिए आफत बने हुए थे। खामनेई का संघर्ष हमेशा याद रखा जाएगा। एक मात्र ऐसा नेता जो मरते दम तक एक महाशक्ति के सामने नहीं झुका। अगर मुस्लिम देश भविष्य में एक होने की कोशिश करें तो वे खामेनेई के बलिदान को याद करें कि गुलामी से बेहतर है कि चुनौती दी जानी चाहिए।
खामनेई के बाद ईरान में राजनीतिक असंतुलन बन जाएगा क्योंकि हर देश में सता के लिए दो गुटों का टकराव होना स्वाभाविक है लेकिन मुस्लिम देशों की जनता इस टकराव से बाहर निकल कर कभी अपने प्रभुत्व और हथियारों की आत्मनिर्भरता पर नहीं सोचती। मुस्लिम देशों की जनता की स्थति तो आने वाले समय में अमेरिका के शोषण का शिकार होगी ही लेकिन खामनेई की मौत के बाद एक बार मुस्लिम देशों की चुनौती में विराम लगेगा जो कहीं न कहीं रूस और चीन के लिए बुरे संकेत होंगे। क्योंकि जैसे ही वेनेज़ुएला और ईरान पर अमेरिका अपना प्रभुत्व बढाएगा तो लगभग एशिया में अमेरिका अपने आर्थिक और सामरिक उद्देश्यों की पूर्ति कर अपने महाशक्ति मिशन को बनाएं रखनें में सफल होगा। खमनेई की मौत का कुछ लोग ईरान में जश्न भी मनाते नज़र आए क्योंकि ईरान सहित अनेक मुस्लिम देशों में नवीन जनरेशन स्वतंत्रता तथा आधुनिक संस्कृति अपनानें की मांग करती आई है जो इस्लामिक राष्ट्र की भावना में महिलाओं को पहनावें तथा आधुनिक संस्कृति के अनूरूप रहने की अनुमति नहीं है। अगर मुस्लिम देशों को आगे बढ़कर विश्व के शक्तिशाली देशों में शामिल होना है तो सबसे पहले उन्हें धार्मिक कट्टरवाद को कम कर आधुनिक शिक्षा और तकनीकी निवेश पर काम करना होगा तथा पड़ोसी मुस्लिम देशों से आपसी फुट को ख़त्म कर शिया सुन्नी मतभेद को खत्म करना होगा तथा विकसित देशों से तकनीकी और शिक्षा हासिल कर आधुनिक धर्म की जगह वैश्विक दौड़ में शामिल होकर अपने अपने राष्ट्रों को हथियारों के साथ साथ सामरिक और कूटनीतिक तरीके से मजबूत करना होगा जैसा उतरी कोरिया ने किया है जिससे कोई महाशक्ति सीधे तोर पर आंख ना दिखा सकें।

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