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वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति और अमेरिका के बीच टकराव: सत्ता, तेल और राजनीति की जटिल कहानी
दुनिया की राजनीति में कुछ रिश्ते इतने उलझे हुए होते हैं कि वे सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। अमेरिका और वेनेज़ुएला का रिश्ता भी ऐसा ही है। एक समय दोनों देशों के बीच व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध सामान्य थे, लेकिन जैसे-जैसे वेनेज़ुएला की राजनीति बदली, अमेरिका के साथ टकराव गहराता चला गया। यह टकराव केवल नेताओं की आपसी नापसंदगी नहीं है, बल्कि इसके पीछे तेल, सत्ता, विचारधारा और अंतरराष्ट्रीय दबावों की लंबी कहानी छिपी हुई है।
वेनेज़ुएला दक्षिण अमेरिका का वह देश है जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है। यही कारण है कि यह देश हमेशा से वैश्विक शक्तियों की नजर में रहा है। जब वेनेज़ुएला में ह्यूगो चावेज़ सत्ता में आए, तब उन्होंने अमेरिका-विरोधी समाजवादी नीति अपनाई। उन्होंने खुले तौर पर अमेरिका की नीतियों की आलोचना की और कहा कि अमेरिका लैटिन अमेरिका के देशों का आर्थिक शोषण करता है। यही वह मोड़ था जहाँ से दोनों देशों के रिश्तों में दरार पड़नी शुरू हुई।
चावेज़ के बाद निकोलस मादुरो राष्ट्रपति बने। मादुरो ने भी चावेज़ की नीतियों को आगे बढ़ाया और अमेरिका के प्रभाव से दूरी बनाए रखी। दूसरी ओर अमेरिका का आरोप रहा कि मादुरो की सरकार लोकतांत्रिक नहीं है, चुनाव निष्पक्ष नहीं होते और मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जाता है। इसी आधार पर अमेरिका ने वेनेज़ुएला पर कई आर्थिक प्रतिबंध (sanctions) लगाए। इन प्रतिबंधों का उद्देश्य था मादुरो सरकार पर दबाव डालना ताकि वह सत्ता छोड़े या सुधार करे।
लेकिन इन प्रतिबंधों का सबसे बड़ा असर आम जनता पर पड़ा। वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था पहले ही कमजोर थी। तेल पर अत्यधिक निर्भरता, गलत आर्थिक नीतियाँ और भ्रष्टाचार के कारण देश संकट में था। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद हालात और बिगड़ गए। महँगाई हजारों प्रतिशत तक पहुँच गई, लोगों को खाने-पीने की चीज़ें और दवाइयाँ तक मिलना मुश्किल हो गया। लाखों लोग देश छोड़कर भागने लगे। इस मानवीय संकट ने दुनिया का ध्यान वेनेज़ुएला की ओर खींचा।
अमेरिका ने मादुरो सरकार को अवैध बताते हुए विपक्षी नेता जुआन गुएदो को अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में मान्यता दे दी। यह एक बहुत बड़ा राजनीतिक कदम था। इसका अर्थ था कि अमेरिका खुले तौर पर वेनेज़ुएला की सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रहा है। मादुरो सरकार ने इसे अमेरिका की साजिश बताया और कहा कि अमेरिका देश में तख्तापलट करवाना चाहता है ताकि वह वेनेज़ुएला के तेल संसाधनों पर नियंत्रण कर सके।
यह टकराव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक भी है। अमेरिका पूँजीवादी लोकतंत्र का समर्थक है जबकि मादुरो सरकार खुद को समाजवादी और अमेरिका-विरोधी बताती है। मादुरो अक्सर अपने भाषणों में कहते हैं कि अमेरिका लैटिन अमेरिका के देशों को गुलाम बनाना चाहता है और उनकी संप्रभुता को खत्म करना चाहता है। दूसरी ओर अमेरिका कहता है कि वह वेनेज़ुएला के लोगों की आज़ादी और लोकतंत्र के लिए खड़ा है।
इस संघर्ष में रूस, चीन और ईरान जैसे देश भी शामिल हो गए। वे मादुरो सरकार का समर्थन करते हैं क्योंकि वे अमेरिका के वैश्विक प्रभाव को संतुलित करना चाहते हैं। इससे वेनेज़ुएला अमेरिका और उसके विरोधी गुटों के बीच एक तरह का राजनीतिक मैदान बन गया है।
असल सवाल यह है कि इस पूरे टकराव में नुकसान किसका हो रहा है? जवाब है — वेनेज़ुएला की जनता का। राजनीतिक जिद, अंतरराष्ट्रीय शक्ति संघर्ष और वैचारिक लड़ाई के बीच आम लोग पिस रहे हैं। बेरोज़गारी, भूख, पलायन और असुरक्षा उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी बन चुकी है।
आज स्थिति यह है कि अमेरिका और वेनेज़ुएला के बीच रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हैं, लेकिन दोनों पूरी तरह संबंध तोड़ भी नहीं पा रहे। कारण है तेल, भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय दबाव। कभी-कभी बातचीत के संकेत मिलते हैं, कभी प्रतिबंध ढीले किए जाते हैं, तो कभी फिर सख्ती बढ़ जाती है।
यह मामला हमें यह सिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल देशों के बीच नहीं होती, बल्कि उसके असर करोड़ों आम लोगों की ज़िंदगी पर पड़ते हैं। सत्ता की लड़ाई, संसाधनों की लालच और विचारधाराओं की जंग में अक्सर मानवता पीछे छूट जाती है।
वेनेज़ुएला और अमेरिका के बीच का यह टकराव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें दिखाता है कि जब ताकतवर देश किसी कमजोर देश की राजनीति में हस्तक्षेप करते हैं, तो उसके परिणाम कितने गहरे और लंबे समय तक रहने वाले होते हैं। यह सिर्फ एक देश की कहानी नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल सोच-समझकर न किया जाए तो वह विनाश का कारण बन सकती है।
US Venezuela war background: पृष्ठभूमि: क्यों तनाव बढ़ा?
अमेरिका और वेनेज़ुएला के बीच रिश्ते दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं। वेनेज़ुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार हैं, और अमेरिका ने लंबे समय से मादुरो सरकार पर लोकतंत्र और मानवाधिकारों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। 2025 में अमेरिका ने मादुरो शासन के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंधों को और तेज़ कर दिया और कई वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों एवं तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए थे ताकि तेल राजस्व पर नियंत्रण और राजनीतिक दबाव बनाया जा सके।
इसके अलावा अमेरिका ने वेनेज़ुएला की “Cartel of the Suns” नामक समूह को आतंकवादी संगठन भी घोषित किया था, यह कहते हुए कि यह नशीले पदार्थों के तस्करी और हिंसा में शामिल है।
Operation Southern Spear: अमेरिका की सैन्य रणनीति
दिसंबर 2025 में अमेरिका ने “Operation Southern Spear” नामक अभियान शुरू किया, जिसके तहत उस इलाके में एक समुद्री ब्लॉकेड लगाया गया जिसमें अमेरिकी सुरक्षा बलों ने वेनेज़ुएला से जुड़े कई तेल टैंकरों को जब्त किया। यह क़दम ईंधन व्यापार पर दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया था।
साथ ही कारिबियन सागर और वेनेज़ुएला के तट के पास अमेरिका ने ड्रोन और नौसेना गतिविधियाँ बढ़ा दीं ताकि कथित रूप से नशीले पदार्थों का कारोबार और शासन के राजस्व मार्गों को बाधित किया जा सके।
जनवरी 2026: सैन्य हमले और मादुरो की गिरफ्तारी
2026 की शुरुआत में तनाव चरम पर पहुँच गया। अमेरिका ने वेनेज़ुएला के खिलाफ हवाई और सैन्य हमले शुरू किए और कराकस सहित कई स्थानों पर विस्फोटों की आवाज़ें सुनी गईं। वेनेज़ुएला सरकार ने इसे एक बड़े सैन्य आक्रमण के रूप में बताया और देश में आपातकाल घोषित कर दिया।
इसके बाद ऐसा हुआ जो किसी ने कल्पना भी नहीं की थी — अमेरिकी डेल्टा फोर्स यूनिट ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में लिया और उन्हें अमेरिका ले जाया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि यह ऑपरेशन “सफल” रहा और अमेरिका फिलहाल वेनेज़ुएला का संचालन करेगा ताकि “सुरक्षित और लोकतांत्रिक संक्रमण” सुनिश्चित किया जा सके।
अमेरिका के एहतियाती कदमों के दौरान कई नागरिकों के मारे जाने और सैनिकों के घायल होने की रिपोर्टें भी आईं, जिससे स्थिति और भी पेचीदा हो गई।
क्या यह आधिकारिक रूप से सत्यापित है?
हालाँकि कुछ समाचार स्रोतों ने जबरदस्त सैन्य हमले और गिरफ्तारी की पुष्टि की है, वहीं कुछ रिपोर्टें और सोशल मीडिया पोस्ट इसे विवादित और अभी पूर्ण आधिकारिक पुष्टि के बिना दावा करार देती हैं, जिससे अटकलों का दौर भी शुरू हो गया है।
डेल्सी रोड्रिग्ज का अंतरिम नेतृत्व
मादुरो की गिरफ्तारी के बाद वेनेज़ुएला की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज को अंतरिम राष्ट्रपति नामित किया गया है। वह रूस और चीन से समर्थन पाने की कोशिशें जारी रख रही हैं और अमेरिका से रिश्तों के बारे में सावधान रवैया अपना रही हैं।
वैश्विक स्तर पर प्रतिक्रिया
संयुक्त राष्ट्र और विश्व नेताओं की प्रतिक्रियाएँ
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने अमेरिका की कार्रवाई को “खतरनाक मिसाल” बताते हुए चिंता जताई कि यह दूसरे देशों की संप्रभुता के लिए गंभीर उदाहरण हो सकता है।
रूस और चीन ने अमेरिका की सैन्य कार्रवाई की कड़ी आलोचना की है और अमेरिका से वैध रूप से चुने गए नेताओं की रिहाई की अपील की है।
विभिन्न देशों की प्रतिक्रियाएँ
कुछ देशों ने अमेरिका के कदम को लोकतंत्र के लिए सकारात्मक कदम बताया, तो अन्य ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करार दिया। उदा.:
अर्जेंटीना के राष्ट्रपति ने इसे “नए स्वतंत्रता युग” के रूप में समर्थन दिया।
ब्राज़ील और बेलारूस ने इसे “अमेरिकी आक्रमण” बताया।
चिली और कई अन्य देशों ने शांतिपूर्ण समाधान की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।
उत्तर कोरिया की तीखी आलोचना
उत्तर कोरिया ने इस कार्रवाई को “सबसे गंभीर संप्रभुता में हस्तक्षेप” करार दिया है और अमेरिका को कठोर शब्दों में फटकार लगाई है।
अमेरिका का तर्क: नशीले पदार्थों और लोकतंत्र
अमेरिका का कहना है कि मादुरो शासन न सिर्फ लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कुचल रहा है बल्कि ड्रग तस्करी और आतंकवादी नेटवर्क से भी जुड़ा है। पिछले साल अमेरिका ने Cartel of the Suns को आतंकवादी संगठन घोषित किया था, और मादुरो सहित कई अधिकारियों पर नशीले पदार्थों के कारोबार में शामिल होने के आरोप लगाए थे।
अमेरिका के यह भी आरोप रहे हैं कि वेनेज़ुएला की ऊर्जा संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा है, और इसके राजस्व का इस्तेमाल शासन को बनाए रखने और अवैध गतिविधियों के समर्थन में किया जा रहा है।
स्थिति गतिशील: आगे क्या हो सकता है?
यह एक स्थिर स्थिति नहीं है — अमेरिका और वेनेज़ुएला के बीच टकराव अब केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं रहा, बल्कि यह सैन्य, आर्थिक, और वैश्विक शक्ति संतुलन का मुद्दा बन चुका है। अमेरिका फिलहाल वेनेज़ुएला के तेल संसाधनों और शासन नियंत्रण को लेकर योजना बना रहा है, जबकि वेनेज़ुएला का नेतृत्व अंतरिम सरकार के रूप में स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहा है।
प्रधान सवाल यह है कि क्या यह संघर्ष धीरे-धीरे शांत होगा, या यह एक लंबे समय तक चलने वाली आर्थिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा में बदल जाएगा? दुनिया आज इस पर नजर गड़ाए बैठी है।

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