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| SC ST OBC in India |
भारत में आर्थिक संसाधनों तथा देश की व्यवस्था की शीर्ष संस्थाओं में ब्राह्मणवाद तथा SC ST OBC के प्रतिनिधत्व और पिछड़ेपन का विस्तृत विश्लेषण
आजादी से पहले भारत में अंग्रेजों का शासन था उससे पहले मुग़ल और विभिन्न राजवंशों का शासन रहा था इसलिए ब्रिटिश शासन से पहले भारत में संपत्ति और संसाधनों के अधिकारों की बात करना औचित्य पूर्ण और सटीक नहीं है क्योंकि अधिकतर राज्य भू-भाग का क्षेत्र उसी शासक के अधीन होता था जो सेना के साथ अधिक युद्धों में विजय प्राप्त करता था। लेकिन मुगलकालीन युग के अंतर्गत राजपूत शासकों का प्रांतीय वर्चस्व और सामंतवादी व्यवस्था में अधिकतर क्षेत्र इन्हीं क्षेत्रीय शासकों के अधीन आता था लेकिन अंग्रेजों के आने के बाद यह प्रांतीय संसाधन भी इतने लाभकारी नहीं रह गये थे क्योंकि अंग्रेजों ने मशीनरी और भौतिकवाद को ज्बयादा बढ़ावा दे दिया था। अंग्रेजी हुकूमत के काल में ही धीरे धीरे राजपूत शासन कमजोर हो गये । तत्पश्चात आजादी के समय
1947 में स्वतंत्रता और भारतीय संघ में विलय के साथ ही राजपूत शासकों की राजनीतिक और प्रशासनिक शक्ति कम हो गई, और बाद में भूमि सुधार कानूनों (जैसे जमींदारी उन्मूलन) के तहत उनकी जमीनें तथा 1971 में प्रीवी पर्स की समाप्ति से उनके विशेषाधिकार छीन लिए गए। यह एकीकरण प्रक्रिया के तहत हुआ, जिसमें रियासतों का भारतीय संघ में विलय हुआ। 1947 में स्वतंत्रता के बाद, राजपूत शासकों को अपना राज्य भारत में एकीकृत करने के लिए सहमत होना पड़ा, जिससे उनकी स्वतंत्रता समाप्त हो गई। साथ ही स्वतंत्रता के बाद, जमींदारी उन्मूलन कानूनों के कारण जमींदारों और राजपूत ताल्लुकदारों के पास मौजूद बड़ी ज़मीनें राज्य सरकार के पास चली गईं। अंत में 1971 में संविधान के 26वें संशोधन के माध्यम से, पूर्व शासकों के 'प्रीवी पर्स' (निजी कोष) और विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया गया, जिससे उनकी आर्थिक और सामाजिक शक्ति काफी कम हो गई। इस प्रकार स्वतंत्र भारत में प्रत्येक व्यक्ति को जमीन और जीवनयापन संपत्ति का हक मिला।
लेकिन बात को गहराई से समझें तो यह कोई खास बदलाव नहीं था वैसे पहले यह संपत्ति सभी राजपूत वर्ग के पास नहीं थी केवल राजघरानों के पास थी इसलिए गांवों में रहने वाले सामान्य राजपूत जातियां सामान्य जीवन जी रही थी।
राजपूत वर्ग जो राजशाही वर्ग से था वो ठगा गया क्योंकि वे इस संपत्ति को कानूनी और कूटनीतिक तरीके से नहीं बचा सकें क्योंकि आजादी (1947) के बाद राजपूत शासकों की रियासतें, 18,700 से अधिक किले और लगभग 40 लाख एकड़ जमीन भारत संघ में शामिल कर ली गई।
आजादी से पहले पारंपरिक रूप से राजपूतों का मुख्य ध्यान पहले युद्धों, सीमाओं की रक्षा आदि पर रहा। हालांकि जो शासक वर्ग था उन्होंने अपने राजकुमारों को अच्छी शिक्षा दिलाने कोशिश की विदेशों में भेजा। लेकिन आखिर वे ऐसा आधार तय नहीं कर सकें जिससे उनका पूरा वर्ग आज आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो सकें तथा आर्थिक संसाधनों पर अधिकार जमा सकें, यह उनकी सबसे बड़ी भूल थी। राजपूत शासकों ने अपने जातीय वर्ग के लिए वो स्त्रोत नहीं बनाए जो उन्हें बनाने चाहिए थे।
क्षत्रिय वर्ग वर्ण व्यवस्था के हिसाब से रक्षा के लिए बनाया गया था इसलिए वे अधिकतर युद्धों और शासन विस्तार और अधिकार क्षेत्र बढ़ाने की जद्दोजहद में ही रहा ऊपर से अंग्रेज आए तो उनसे वो भी हिस्सा छिन गया।
लेकिन राजवंश के समय से ही एक जाती वर्ग रहा जिसने अपनी दूरगामी सोच और तीक्ष्ण दिमाग से अपने वर्ग की जिन्दगी बदल दी। यह था ब्राह्मण वर्ग।
आजादी से पहले और बाद में ब्रहामण वर्ग हर क्षेत्र में खुद को स्थापित करने में सफल रहा। ब्रहामण वर्ग के बाद दुसरे पायदान पर रहा वैश्य वर्ग। हालांकि राजपूत भी स्वर्ण वर्ग में आते हैं लेकिन ब्राह्मणों की दुरगामी और उच्च स्तर की चतुर नीतियों के कारण वह सवर्ण वर्ग में हमेशा शीर्ष पर रहा है।
राजपूत जाति स्वर्ण वर्ग में होने के बावजूद आधुनिक समय में व्यापार और उद्यमिता (Business) में कमी के कारण, अन्य समुदायों की तुलना में आर्थिक रूप से पिछड़ गई।
पूर्वजों की भव्य जीवनशैली बनाए रखने का अहंकार और खर्चीला स्वभाव, आय के सीमित साधनों के बावजूद संपत्ति का क्षरण करता रहा। पीढ़ी दर पीढ़ी संपत्ति (जमीन) के बंटवारे से व्यक्तिगत हिस्सेदारी बहुत कम हो गई।
हालाँकि, कुछ पूर्व राजघराने आज भी होटल व्यवसाय या राजनीति (पर्यटन) के माध्यम से समृद्ध हैं, लेकिन जमींदार परिवारों और सामान्य राजपूत समुदाय के पास अब पहले जैसी आर्थिक संपन्नता नहीं रही।
लेकिन क्या कारण रहे कि ब्राह्मण जाति वर्ग अपनी आर्थिक स्थिति के साथ साथ अन्य क्षेत्रों में भी वर्चस्व बनाए रखने में कामयाब हुआ?
इसके लिए हमें इतिहास और धर्म के उदय को समझना पड़ेगा
राजशाही काल से ही ब्रहामण वर्ग ने धर्म के माध्यम से अन्य वर्गों को अपने लिए आर्थिक टूल्स की तरह इस्तेमाल करते हुए उनके लिए काम करने के लिए मानसिक रूप से बाध्य किए रखा। ब्राह्मण वर्ग की सोच और समझ भविष्य में होने वाले बदलावों पर स्पष्ट और असाधारण रूप से थी।
पहले शासकों को मंत्रों, हवनों तथा कर्मकांडों में डाले रखा जिसके फलस्वरूप धनी शासक वर्ग देवी-देवता के नाम पर तथा उनकी पूजा अर्चना के नाम पर अकूत धन संपदा लुटाते रहे जिससे हिन्दू धर्म के सभी मंदिरों में अकूत संपत्ति सोना चांदी हुआ करते थे। युद्धकालीन समय में भले ही राजपूत योद्धा थे लेकिन पर्दे के पीछे पूरी व्यवस्था को व्यवस्थित करने में ब्राह्मण वर्ग का ही हाथ था। भले ही किसी राजपूत शासक को गले का हार पंडित को दान करना हो या मंदिरों के लिए भूमि, निर्माण यहां तक धर्म के लिए युद्ध में झौंकने की शक्ति का स्त्रोत भी ब्राह्मण वर्ग का साहित्य और शिक्षाएं हुआ करती थी। अधिकतर राजकुमारों के गुरु ब्राह्मण हुआ करते थे लेकिन वे युद्ध में अपने बच्चों को नहीं बल्कि राजपूत शासकों के राजकुमारों को अस्त्र शस्त्र की शिक्षा देते थे। अगर हम सच्चाई से समझें तो यह वर्ग कितना चालाक वर्ग था कि आज भी ब्राह्मण वर्ग दान-दक्षिणा गौरव के साथ प्राप्त करते हैं तथा उसी दान से अपनी संतानों को उच्च शिक्षा दिलाने में कामयाब हो जाते हैं।
इतिहास में देखें तो
राजपूत काल (लगभग 600-1200 ईस्वी) में ब्राह्मणों की समृद्धि का मुख्य कारण राजाओं द्वारा बड़े पैमाने पर भूमि अनुदान (ब्रह्मदेय), प्रशासनिक व कूटनीतिक पदों पर नियुक्ति, और धार्मिक-सामाजिक वर्चस्व था। यद्यपि वे प्रत्यक्ष युद्ध नहीं लड़ते थे, वे राज्य के बौद्धिक और प्रशासनिक स्तंभ थे, जो आर्थिक संसाधनों को प्रबंधित करते थे। स्वतंत्रता से पहले और बाद में भी, शिक्षा और प्रशासनिक पदों पर पकड़ के कारण उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत बनी रही।
राजपूत शासकों द्वारा ब्राह्मणों को कर-मुक्त भूमि (ब्रह्मदेय/अग्रहार) दान की जाती थी, जिससे वे जमींदार बन गए।
वे केवल पुरोहित नहीं, बल्कि मंत्री, दूत, और प्रशासनिक अधिकारी (कायस्थों की भांति) के रूप में कार्य करते थे।
कुछ ब्राह्मणों ने व्यावसायिक मार्गों पर बसकर व्यापार और साहूकारी (Money Lending) अपना ली थी। ब्राह्मणवादी व्यवस्था में उनकी सर्वोच्च स्थिति ने उन्हें दान और दक्षिणा के माध्यम से धन अर्जित करने का विशेषाधिकार दिया।
आजादी के पहले और बाद आर्थिक संसाधन पर पकड़ बनाने में ब्राह्मण वर्ग सबसे सफल रहा जो आजादी के बाद भी सबसे सक्षम वर्ग बना हुआ है। पारंपरिक रूप से शिक्षित वर्ग होने के कारण, औपनिवेशिक काल और आधुनिक भारत में शिक्षा व सरकारी नौकरियों पर ब्राह्मणों का प्रारंभिक प्रभुत्व रहा।
वे प्रशासन, शिक्षा और संस्थागत संरचनाओं में महत्वपूर्ण पदों पर बने रहे, जिससे संसाधनों पर पकड़ बनी रही।
सामाजिक प्रतिष्ठा और बौद्धिक गतिविधियों में संलग्नता ने आर्थिक रूप से उन्हें उन्नत बनाए रखा। आजादी के बाद फिर उसी प्रकार अभिजात्य वर्ग का वर्चस्व बने हुए रहता है
हालांकि आजादी के बाद संविधान और समानता तथा जनकल्याणकारी योजनाओं के चलते इसी अभिजात्य वर्ग में अन्य जाति वर्ग का मिश्रण हुआ लेकिन उतना नहीं हुआ जितना होना चाहिए था। इसलिए आज उच्च पदों पर समानता और प्रतिनिधित्व की बात होती रहती है।
आजादी के बाद भी भारत में आर्थिक संसाधनों के वितरण और देश के संस्थागत ढांचे पर अभिजात्य वर्ग का वर्चस्व रहा है जिसमें उच्च पद , उच्च स्तर के राजनीतिक और नौकरशाही पदों पर आदि।
भारत में वर्तमान अभिजात्य वर्ग (Elite Class) में मुख्यतः अत्यधिक धनी व्यवसायी, प्रभावशाली राजनेता (वंशवादी), वरिष्ठ नौकरशाह, शीर्ष तकनीकी उद्यमी और उच्च मीडिया दिग्गज शामिल हैं, जो नीति निर्माण और आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण रखते हैं। लेकिन राहत की बात यह है कि यह वर्ग अब केवल पारंपरिक कुलीन परिवारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें 'नव-धनी' वर्ग भी तेजी से शामिल हो रहा है।
हालांकि संविधान, भुमि सुधार कानून,आरक्षण तथा पिछड़े वर्गों के उत्थान की विभिन्न योजनाओं से भारत में अभिजात्य वर्ग के दायरें में बढ़ोतरी तो हुई , लेकिन उस रूप से नहीं हुई जितनी प्रतिनिधित्व के आधार पर होनी चाहिए थी। इसमें
सबसे बड़ी बाधा थी जाति व्यवस्था। जातिगत भेदभाव के कारण SC,ST और OBC वर्ग की स्थिति हमेशा खराब रही क्योंकि सता और आर्थिक संसाधनों पर कब्जे की शीर्ष व्यवस्था पर इन निम्न जातियों को पहुंचने नही दिया गया।
इन निम्न जातियों को अवसर तो दूर की बात , इन जातियों को हमेशा से भेदभाव के साथ साथ प्रताड़ित भी किया गया इन जातियों से ब्राह्मण वर्ग और वैश्य वर्ग ने अपने आर्थिक साधनो की तरह उपयोग कर शोषित किया गया, इसलिए भारत के संविधान निर्माताओं ने इन निम्न वर्गों को कम से कम शोषण से बचाने तथा कुछ अवसर प्रदान करने के लिए आरक्षण दिया। लेकिन सबसे बड़ी बात आरक्षण देकर जीवन यापन के लिए छोटी बड़ी नौकरियां नहीं है। आज आरक्षण की वजह से यह वर्ग केवल अपने लिए रोटी कपड़ा का ही जुगाड कर पाया है। लेकिन सबसे बड़ी चीज थी देश के आर्थिक, राजनीतिक और संस्थागत ढांचों पर अधिपत्य जहाॅ से सबकुछ तय होता है जिसमें निम्न वर्गों की कल्याणकारी योजनाएं , उच्च शिक्षा,बजट , राजकीय कोष , उच्च स्तर की नौकरशाही, न्यायिक पद , विभिन्न सेक्टर्स आदि इन प्रमुख स्थानों पर कब्जा करना सबसे बड़ी बात थी। जिसमें ब्राह्मण वर्ग को कोई दूसरा वर्ग टक्कर नही दे सका।
हालांकि आजादी के बाद पारदर्शिता बढ़ने तथा लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था के कारण सीधे तौर पर आर्थिक संसाधनों और सता के स्रोतों पर अधिकार बनाए रखना पूर्ण रूप से संभव नहीं था यह बात ब्राह्मण वर्ग सदियों से जानता था।
इसलिए उन्होंने अपने सबसे ताकतवर हथियार का चुनाव किया वो था धर्म, जातिगत भेदभाव तथा धार्मिक कर्मकांड
क्योंकि यह एक मात्र ऐसी चीज़ है जो गरीब हो या अमीर यह सभी को खींचकर लाएगी आज भी धर्म के नाम पर तथा देवी-देवता के नाम पर मंदिरों में पूजा-अर्चना तथा अनेक कर्मकांडों में पंडितों के परिवार रोजगार और अच्छी आय के साथ अन्य जाति वर्ग से बेहतरीन जीवन यापन कर रहे हैं।
ब्राह्मण वर्ग की समस्याए और बाधाएं कम नहीं रही है उन्होंने समय समय पर अपने इस आर्थिक स्तंभ को ख़तरे में महसूस किया जिसमें सबसे बड़ी चुनौती थी औद्योगिक क्रांति तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ साथ बौद्धिक विकास की आंधी जिसने दुनिया में अनेक लोगों को अंधविश्वासों से मुक्त करवाया। पाश्चात्य शिक्षा, वैज्ञानिक रिसर्च, तकनीकी और कम्प्यूटर युग में इस वर्ग के उन आर्थिक रिसोर्स में घाटा ज़रूर किया लेकिन दूरदर्शी सोच और अपने दिमाग की ताकत से इस वर्ग ने इन सबके बीच भी उस रूढ़ीवादी धार्मिक परम्पराओं को ख़त्म नहीं होने दिया यह ब्राह्मणों की सबसे बड़ी जीत थी। इसके बाद ब्राह्मण वर्ग ने इस परम्परा को जारी रखने के लिए जनता का उपयोग किया। इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए उन्होंने वास्तविक धार्मिक और सांस्कृतिक व्यवस्था का सहारा लिया तथा इसके अस्तित्व को बचाए रखने के लिए निम्न वर्गों को ही रक्षक और दीवार के रूप में खडा कर दिया।
लेकिन विडंबना यह रही की धार्मिक कर्मकांड और धार्मिक शिक्षा साहित्य कभी ब्राम्हण वर्ग के एकाधिकार में रहा था वह धीरे-धीरे राजनीति तथा सता में बने रहने के लिए वोटबैंक का टूल बन कर रह गया।
इस प्रकार धीरे धीरे धार्मिक वर्चस्व में अन्य उच्च वर्गीय जातियों का दायरा बढ़ गया तथा विभिन्न प्रकार की ब्राह्मण जातियों में इसपर अधिकार की जद्दोजहद बढ़ गई। दूसरी तरफ आधुनिक शिक्षा साहित्य तथा वैज्ञानिक खोजों ने धीरे-धीरे लोगों में जागरूकता पैदा करने का काम किया जिसमें युवा जनरेशन धार्मिक अंधविश्वास कर्मकांडों आदि से दूर होने लग गई जिससे यह आर्थिक संसाधनों का क्षेत्र कमजोर और विवादित बन गया।
हालांकि वास्तविक तौर पर किसी व्यक्ति के लिए धर्म हमेशा व्यक्तिगत और आत्मिक विषय होता है लेकिन मुस्लिम आक्रांताओं ने भारत में हिन्दू धर्म को हानि पहुंचाने के कारण
तथा अन्य धर्म के प्रचारकों ने अपने धर्म का दायरा बढ़ाने की होड के कारण विभिन्न हिन्दु धर्मप्रचारकों और हिन्दू धर्म के नेतृत्वकर्ताओं को सभी हिन्दुओं में धर्म के प्रति सार्वजनिक रूप से संगठित होने का जो सिलसिला शुरू हुआ उसमें ब्राह्मण वर्ग ने अपने आर्थिक और व्यवसायिक तौर तरीकों को ओर भी मजबूत किया।
आजादी के बाद, ब्राह्मण वर्ग ने धर्म को अपनी आर्थिक आय का साधन बनाए रखने के लिए मुख्य रूप से मंदिर प्रबंधन, पूजा-पाठ, और अनुष्ठानिक सेवाओं पर एकाधिकार को जारी रखा। उन्होंने धार्मिक ज्ञान, ज्योतिष और सामाजिक संस्कारों (जैसे विवाह, संस्कार) को अपनी आजीविका का जरिया बनाया, और साथ ही शिक्षा व सरकारी क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति से धार्मिक वर्चस्व को आर्थिक रसूख में बदला।
जैसे ही दुनिया आधुनिक तकनीकी और व्यवसायिक और वैज्ञानिक युग में आगे बढ़ी तो ब्राह्मण वर्ग इस दौड़ में शामिल हो गये इस दौड़ में ब्राह्मण वर्ग के शीर्ष लोग ही शामिल हो गये बाकि शेष वर्ग मंदिरों की व्यवस्था पूजा और धार्मिक कर्मकांडों के कार्यों में बने रहें तथा उच्च स्तरीय ब्राह्मण वर्ग की स्थिति को यथावत रखनें में अन्य वर्गों को मूर्ख बनाए रखने तथा धार्मिक मामलों में उलझाए रखनें में कामयाब बने रहे।
ब्राह्मण वर्ग की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि धर्म और धार्मिक कर्मकांडों से अपनी आय तथा प्रतिष्ठा को वैज्ञानिक और आधुनिक युग में भी यथावत बनाएं रखना।
इसके लिए जरूरत थी सेक्युलरवाद और युरोप में पुनर्जागरण काल के बाद हुए विभिन्न जागरूक संगठनों की आवाज के खिलाफ एक लम्बी लड़ाई को लड़ना। ब्राह्मण वर्ग जानता था कि यह लड़ाई वो सीधे तौर पर लड़ेंगे तो वो अपने इस उद्देश्य से भटक जायेंगे इसलिए उन्होंने सबसे बड़ी चाल चली कि क्यो नही यह लड़ाई स्वयं निम्न वर्ग SC,ST और OBC वर्ग से ही आपस में लड़ाई जाए। ब्राह्मण वर्ग यह भी कामयाब हुआ जब जब इसी वर्ग में विभिन्न बुद्धिजीवियों ने समता, प्रतिनिधित्व वैज्ञानिक दृष्टिकोण की शिक्षा तथा पश्चिमी विश्व की तरह मानव अधिकारों की बात की तो उनको सबसे पहले अपने ही वर्ग के उन ब्राह्मणवादी व्यवस्था के मानसिक गुलाम रक्षकों से लडना पड़ा। हकीकत में आज भी ऐसे मुद्दे उठते हैं तब यह निम्न वर्ग स्वयं विरोध में अपने वर्ग के लोगों से भिड़ जाता है ऊपर से ब्राह्मण वर्ग केवल इनमें यह मानसिक तथा दिमाग में धार्मिक कट्टरवाद के विचार बनाएं रखने की नित नई तकनीकों का स्तेमाल करता रहता है।
इस प्रकार आजादी के बाद, ब्राह्मण वर्ग ने अपनी पारंपरिक धार्मिक वर्चस्व और कर्मकांड-आधारित रोजगार (पुजारी, अनुष्ठान) को बनाए रखने के लिए वर्ण-जाति व्यवस्था का उपयोग किया। SC, ST, और OBC समुदायों को धार्मिक अनुष्ठानों में 'अधीनस्थ' (नीचे) रखकर और ब्राह्मणवादी विचारधारा के माध्यम से 'पवित्रता' के दावों को मजबूत किया। इसके अलावा, आरक्षण की माँग जैसे सामाजिक-आर्थिक आंदोलनों को कमजोर करने के लिए धार्मिक और जातिगत भावनाओं (धर्म की अफीम) का सहारा लेकर इन वर्गों का उपयोग अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए किया गया।
इस लड़ाई में निम्न वर्गों के अशिक्षित लोग हैं ही लेकिन इस लड़ाई का नेतृत्व करने में सबसे आगे रहा क्षत्रिय वर्ण तथा मूल ओबीसी वर्ग । इसका कारण यह रहा कि इन्हीं की जातियों के देवताओं और लोकदेवताओं को हिन्दू धर्म में अग्रणी बनाए रखा जिससे यह वर्ग हिन्दू धर्म में स्वत्व की भावना बनाएं रख सकें।
आजादी से पहले इन राष्ट्र की मुख्य व्यवस्था में ब्राह्मण वर्ग का दबदबा था ही आजादी के बाद भी वो यथावत कायम रहा इन्हीं वर्षों में औपनिवेशिक काल के बाद जिस तरह मानव अधिकारों और समतावादी आन्दोलन और क्रान्तिकारी विचारों का प्रादुर्भूत हुआ तो भारत में भी इस मामले में बड़ी क्रांति होने का डर बन गया इसलिए कांग्रेस शासन काल में यह वर्ग सेक्युलरवाद के बढ़ते प्रभाव तथा बुद्धिजीवियों के विचारों से प्रभावित होकर इन्होंने थोड़ा उदार रूख़ अपनाया जिनमें वे संवैधानिक अधिकार तथा निम्न और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण और जनकल्याणकारी योजनाओं और कुछ विशेष कानून लागू करने में सहमत हो गये। क्योंकि यहां इस अभिजात्य वर्ग को लगा कि अगर इस समय इन्हें इनकी दयनीय स्थिति से बाहर नहीं लाया गया तो यह आगे चलकर बड़े आंदोलन का रूप ले लेंगे। हालांकि आजादी के बाद भारत के एकीकरण तथा स्वतंत्रता आन्दोलनों में हिस्सा ले रहे विभिन्न वर्गों के लोगों ने संविधान और अधिकारों के बल से कुछ हद तक शीर्ष बागडोर संभालने वाले लोगों के पास पहुंचने में सफलता हासिल की।
औपनिवेशिक काल और आजादी के तुरंत बाद चले विभिन्न गैर-ब्राह्मण आंदोलनों ने शिक्षा, धन और प्रभाव प्राप्त कर चुके अन्य वर्गों को राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था में जगह बनाने में मदद की।
लेकिन आज सबसे बड़ी समस्या यही है कि आरक्षण के बावजूद, भारत में ऐतिहासिक सामाजिक-आर्थिक विषमताएं, शिक्षा तक असमान पहुंच, और उच्च जातियों का प्रशासनिक-निजी क्षेत्र में वर्चस्व निम्न वर्गों की भागीदारी को सीमित करता है। ब्राह्मण वर्ग का शीर्ष पर बने रहने का कारण पीढ़ीगत सांस्कृतिक पूंजी, अच्छी शिक्षा, और नेटवर्क का लाभ होना है। यह 'क्रमिक असमानता' (graded inequality) व्यवस्था, सदियों पुरानी जातीय संरचनाओं और ग्रामीण-शहरी विभाजन के कारण बनी हुई है।
इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ था सेवा सेक्टर तथा विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों का निजीकरण तथा पूंजीवादी व्यवस्था का समावेश होना।
ब्राह्मण वर्ग जानता था कि क्या फर्क पड़ेगा निम्न वर्ग को आरक्षण देकर वे निम्न वर्ग के हाशिए पर बने रहेंगे लेकिन हम देश की शीर्ष व्यवस्था पर कब्जा बनाए रखेंगे जिससे कोई बड़ा नुक़सान नहीं होगा। ब्राह्मण वर्ग जानता था कि आरक्षण केवल निम्न वर्ग को सामान्य जीवन यापन के अवसर देगा ना कि देश की शीर्ष संस्थाओं और देश की शीर्ष शीर्ष व्यवस्था में भागीदारी सुनिश्चित करेगा इसलिए आरक्षण शुरूआत में कोई बड़ी चुनौती नहीं बना।
आजादी के बाद कांग्रेस में ब्राह्मण नेताओं द्वारा अन्य वर्गों को शीर्ष पदों पर मौका देने की सहमति वैचारिक प्रतिबद्धता, लोकतांत्रिक मजबूरी और सामाजिक एकता की जरूरत का परिणाम थी। गांधी-नेहरू के समावेशी दृष्टिकोण, समानता के संवैधानिक वादे, और वोट बैंक की राजनीति ने सभी वर्गों को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। गांधीजी का दृष्टिकोण समावेशी था, जिन्होंने दलितों और पिछड़ों के उत्थान को स्वतंत्रता संग्राम का अभिन्न हिस्सा बनाया।
कांग्रेस एक विशाल जन-आधारित पार्टी थी, जिसे सत्ता में रहने के लिए सभी जातियों और वर्गों के समर्थन की आवश्यकता थी। अन्य वर्गों को प्रतिनिधित्व देना राजनीतिक मजबूरी थी। दूसरी तरफ भारतीय संविधान ने सभी नागरिकों के लिए समान अवसर की गारंटी दी, जिससे सभी जातियों के लिए शीर्ष पदों के दरवाजे खुले। दुनिया में चल रहे समाज सुधार आंदोलन तथा मजदूर वर्ग की क्रान्तिकारी गतिविधियों से उस समय भारत में भी समाज में जाति-आधारित भेदभाव के खिलाफ एक सुधार आंदोलन चल रहा था, और कांग्रेस ने खुद को एक प्रगतिशील पार्टी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। कांग्रेस की स्वार्थ और प्रगतिशील सोच के चलते हर वर्ग के लोग देश की शीर्ष व्यवस्था को संचालित करने वाली शक्तियों के करीब आते गये।
इसके अलावा अन्य वर्गों में, विशेष रूप से पिछड़े वर्गों में, अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ रही थी।
जैसे-जैसे समय बीता, निचले तबके से आने वाले नेता भी राजनीति में सक्रिय हो गए और शीर्ष पदों के लिए अपनी दावेदारी पेश करने लगे। इस सब के दौरान आज आंशिक तौर पर भारत में सभी वर्ग के लोग कम से कम देश की शीर्ष व्यवस्था की दौड़ में शामिल हैं।
लेकिन समय के साथ साथ स्थितियां बदलने लगती है भूमंडलीकरण का दौर शुरू होता है बढ़ती जनसंख्या तथा शक्ति और नेतृत्व की बदलती परिभाषा तथा वैज्ञानिक और तकनीकी युग में मानव दिमाग और प्रगति के बदलते दायरे ने दुनिया को बदल के रख दिया। पूंजीवाद के कारण धार्मिक कट्टरवाद, वर्ग संघर्ष का दौर धीमा हुआ लोगों का विश्वास अब अधिक से अधिक धनार्जन तथा शिक्षा, नौकरशाही , राजनीतिक लाभ , व्यवसायिक सेवा क्षेत्र तथा बाजारीकरण के तुफान में खुद को बनाएं रखनें की होड़ मच गई इस आंधी में भारत की अधिकतर जनता धार्मिक कर्मकांडों तथा अंधविश्वास से दूर होने लगी तो निम्न वर्ग के लोगों का ध्यान अपने अधिकारों,अपने प्रतिनिधित्व तथा आर्थिक और सामाजिक प्रतिष्ठा में अपनी जगह और अवसरों की तरफ ध्यान आकर्षित हुआ।
लेकिन आजादी के बाद लम्बे समय में जिस तरह ब्राह्मण वर्ग में उदय हुए नव शिक्षित और बुद्धिजीवी वर्ग ने बहुत अलग और शक्तिशाली रास्ता इख्तियार किया इस वर्ग ने वो सभी आधुनिक मनौवैज्ञानिक और तकनीकी तथा शिक्षा और वर्तमान वैश्विक मानस को ध्यान में रखते हुए कूटनीतिक तरीका अपनाया। जिससे वे कार्य स्थल और देश के सभी मंचों पर अन्य वर्गों के साथ रहकर भी वो पुरानी ब्राह्मणवादी विचार धारा और जातिगत अलगाववादी सोच से इस निम्न वर्ग को टेक्निकल रूप से कमजोर और शोषित बनाएं रख सकें। इसके लिए सबसे पहले इन्होंने धार्मिक कट्टरवाद, राष्ट्रवाद तथा जातिगत सहानुभूति और श्रेष्ठता की भावना को स्वतंत्रता आन्दोलनों के बाद पुनः जागृत किया जिसमें इस वर्ग ने जो पहले से नौकरशाही, आर्थिक क्षेत्र और राजनीति क्षेत्र में है ने इस कार्य को करने के लिए विभिन्न धार्मिक संगठनों के नेताओं,कथा वाचकों,ख्याति प्राप्त धार्मिक संगठनों के साधुओं , सोशल मीडिया, पत्रकारिता तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के सभी आधुनिक टूल्स का उपयोग करके एक बार पुनः धार्मिक आध्यात्मिक क्षेत्र का उपयोग राजनीतिक और देश की मुख्य संस्थागत प्रणाली में समावेश करवाया जिससे अन्य निम्न वर्ग जागरूकता की बजाय धर्म और जाति के संघर्ष में उलझे रहें।
निम्न वर्ग और मध्यवर्ग के इस उलझनों में फंसे रहने के समय में ब्राह्मण वर्ग ने एक बार पुनः पर्दे के पीछे षड्यंत्रकारी तरीके से देश के शीर्ष व्यवस्था के संचालक तथा उच्च शैक्षिक पदों, सरकारी सेवा के विभिन्न उच्च सेक्टरों में अपनी संतानों को येन-केन प्रकारेण पहुंचाकर देश की सर्वोच्च शक्ति के उद्गम स्थानों पर भौतिक तथा प्रणालीगत रूप से अपनी पकड़ मजबूत की । स्वतंत्रत भारत ने ब्राह्मण वर्ग सहित मिश्रित अभिजात्य वर्ग ने अपनी संतानों को विदेशों में उच्च शिक्षा व्यवसायिक कौशल तथा आधुनिक शैक्षणिक योग्यता हासिल करवानें में देश के बड़े आर्थिक हिस्से का उपभोग किया। जिससे अन्य निम्न वर्गों को पता नहीं चला कि आजादी के बाद 75 वर्षों में देश की शीर्ष व्यवस्था भले ही राजनीतिक हों या औद्योगिक निजी क्षेत्र हो या संस्थाओं और धार्मिक प्रतिष्ठानों पर कब्जा हो हर क्षेत्र में 80-90 फीस अपना प्रतिनिधित्व कायम रखने में कामयाब हो गये।
इसलिए निम्न वर्गों को इस सिलसिले में देश की उच्च शिक्षा और शीर्ष व्यवस्था तक पहुंचने के दौरान इन के साथ संस्थागत भेदभाव हुआ। निम्न वर्गों को देश के शीर्ष व्यवस्था के पदों जैसे न्यायिक,सैन्य, प्रशासनिक सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र के बड़े आर्थिक प्रतिष्ठानों तक पहुंचने में षड्यंत्रकारी ढंग से निम्न वर्गों को पछाड़ा गया। निम्न जाति वर्ग के शिक्षित वर्ग को यह बात समझ नहीं आए इसलिए इनके हाथों में धार्मिक झंडे पकड़ा दिए गए। निम्न वर्ग के अशिक्षित और शिक्षित युवा इस धार्मिक कट्टरवाद और जातिगत अलगाववादी संघर्ष में सक्रिय भूमिका में ही रह गई। धार्मिक नेतृत्व की सभी पंक्तियां भी राजनीतिक और दबाव समूह के रूप में आ गई जिसके पास अंधविश्वास और आध्यात्मिकता आडम्बरों के चलते असंख्य लोगों की भीड़ और जनमत हासिल था। इसलिए राजनीतिक पार्टियों ने इनसे नजदिकियां बढ़ाई जैसे ही राजनीतिक और धार्मिक क्षेत्र के लोगों ने गठजोड़ किया तो देश के अन्य संस्थाओं के मायने बदल गये। हालांकि धार्मिकता और संत परम्परा के लोगों का सता और राजनीति में प्रतिनिधित्व बढ़ा साथ ही देश के आर्थिक और योजना निर्माण क्षेत्र में धार्मिक विचारधारा का प्रभाव भी बढ़ गया। हिन्दू धर्म में जातिगत भेदभाव का सीधा संबंध धार्मिक वर्ण व्यवस्था से है इसलिए इस गठजोड़ में सबसे बड़ी गाज एक बार फिर निम्न और अल्पसंख्यकों पर गिरी। भाजपा का सता में बने रहने के लिए स्वर्ण वर्ग के वोटबैंक का बड़ा महत्व है लेकिन चुनावी गठजोड़ में केवल स्वर्ण वर्ग ही नहीं अन्य वर्गों के वोटों की जरूरत है इसलिए वर्तमान बीजेपी सरकार धार्मिक कट्टरवाद और राष्ट्रवाद के साथ साथ आधुनिक अंतरराष्ट्रीय स्तर की वोट बैंक की डिप्लोमेसी और तकनीकी तौर से सरकारी मशीनरी का उपयोग करने के रास्ते पर चल रही है।
भारत की धार्मिक पृष्ठभूमि और जातीय व्यवस्था हमेशा वोट बैंक का महत्वपूर्ण साधन रही है।
इस सब के पीछे ब्राह्मण वर्ग उच्च स्तर से इन सब चीजों को अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी मशीनरी और संस्थागत संस्थागत ढांचे से इस पूरी व्यवस्था को संचालित करते हुए अपने प्रतिनिधित्व की परिपाटी को विभिन्न बदलते तरीकों और समय के साथ साथ कायम रखने की कोशिश कर रहा है।
इसलिए आज भी उच्च शिक्षा और उच्च स्तर की पूर्ण व्यवस्था में निम्न वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित नहीं हो पाती हैं क्योंकि निम्न वर्ग को ऊपर से पूरा सिस्टम जो पिछले सैकड़ों सालों से बना है वह सिस्टेमेटिक ढंग से वंचित कर रहा है।
इसलिए वर्तमान में UGC (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता के संवर्द्धन) विनियम, 2026 की आवश्यकता उच्च शिक्षा में SC, ST और OBC छात्रों व कर्मचारियों के खिलाफ जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए महसूस की गई। इस एक्ट की मांग मुख्य रूप से दलित और पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधि समूहों व एक्टिविस्टों ने की थी। लेकिन भाजपा सरकार में ऊपरी जातियों का दबदबा माने जाने के बावजूद, इस एक्ट के नए नियमों का विरोध सवर्ण समूहों द्वारा किया जा रहा है। भाजपा सरकार की यह हमदर्दी केवल चुनावी गठजोड़ में फायदा कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट की रोक भी एक विचारणीय पहलु है। हालांकि भाजपा सरकार जो पहले से ही उच्च वर्ग और स्वर्ण वर्ग के आधार पर खड़ी हैं तो उसके लिए इस नये कानून के बनने या ना बनने से कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन विधेयक के पास होने पर भाजपा सरकार को SC ST,OBC वर्ग लोगों से सहानुभूति ज़रूर मिलेगी। भाजपा सरकार जानती है कि जातिगत संघर्ष और सोशल मीडिया कैम्पेन के चलते तथा मौजूदा सरकार और न्यायिक संस्थाओं पर हिन्दू धर्म संगठनों के दबाव के चलते अब भारत में निम्न और पिछड़े वर्गों के लिए स्वर्ण वर्गों के खिलाफ प्रोटेक्शन का नया कानून बनना कितना मुश्किल है इसलिए भाजपा सरकार भली-भांति परिचित हैं कि इस कानून को रोकने की बुराई अपने आप कोर्ट और न्यायिक संस्थाएं ले लेगी।
क्योंकि पिछले सालों में आर एस एस के भाजपा नेताओं तथा हिन्दू धर्म के धार्मिक कट्टरवाद संगठनों तथा धार्मिक प्रचार से जुड़े कथावाचकों और अपने आर्थिक हित और प्रतिष्ठा साधने के उद्देश्य से बने विभिन्न धार्मिक नेताओं ने निम्न वर्गों के करोड़ों लोगों को धर्म के खतरे का डर दिखाकर तथा आध्यात्मिकता विकसित करने के मिश्रित छद्म तरीकों से माइंड वॉश किया ऐसे में निम्न वर्ग और मध्यवर्ग के बेरोजगार युवा देश की वास्तविक व्यवस्था और इसकी गहराइयों की समझदारी से बहुत दूर होकर केवल जातिगत अलगाववादी और धार्मिक कट्टरवादी सोच के शिकार होकर उल्टा ब्राह्मणवादी व्यवस्था के रक्षक के रूप में खड़े हो गये। इस प्रकार सोशल मिडिया और अन्य मंचों पर इन अविवेकी लोगों की फौज हमेशा अपने ही निम्न वर्ग और मध्यवर्ग की पिछड़ी जातियों के समान प्रतिनिधित्व के खिलाफ खड़ी होकर एक आत्मघाती सोच का शिकार हुई।
लेकिन अच्छी बात यह रही कि इस सिलसिले में जब पूंजीवाद और औद्योगीकरण शुरू हुआ तो धार्मिक और जातिगत वर्ग टूटकर एक नये अभिजात्य वर्ग का उदय हुआ जिसे हम आज आर्थिक वर्ग के रूप में पहचानते हैं जिसका विभाजन जाति धर्म नहीं बल्कि आर्थिक क्षमता के आधार पर पूंजीवादी,,मध्यम किसान वर्ग तथा निम्न मजदूर वर्ग के रूप में तैयार हुए।
इस लम्बे परिवर्तन में स्वर्ण वर्ग सहित हर वर्ग में निचले पायदान के लोगों की स्थति दयनीय हो गई। आज गरीबी और समानता की लड़ाई में अकेला दलित वर्ग नहीं है बल्कि हर जाति वर्ग का व्यक्ति आर्थिक तंगी और उच्च शिक्षा तथा भौतिक सुविधाओं से वंचित महसूस कर रहा है।
गांवों में गरीब केवल दलित ही नहीं बल्कि ब्राह्मण, राजपूत सहित विभिन्न उच्च वर्ग की जातियां अभावों का सामना कर रही है।
इस सिलसिले में प्रत्येक जाति का व्यक्ति अपने ही जाति वर्ग के लोगों को पीछे छोड़कर उच्च वर्ग में शामिल हुआ है जिस विशेष वर्ग का प्रभुत्व आज सरकारी संस्थाओं में साफ झलकता है। इस स्वार्थ पूर्ण रवैये ने अपने स्व जातिगत लोगों की सहानुभूति को मधयनजर नहीं रखा उदाहरण के लिए एक राजपूत पूंजीपति या नेता का अपने उस ग़रीब राजपूत समाज से कोई हमदर्दी नहीं है उसी प्रकार आरक्षण के माध्यम से शीर्ष नौकरशाही में स्थान प्राप्त करने वाले दलित व्यक्ति को पीछे गरीब और असुविधाओं में जी रहे उन पिछड़े दलितों से कोई हमदर्दी नहीं है। यह व्यवस्था दिखाती है कि अब जो वर्ग व्यवस्था है वह आर्थिक स्तर और नौकरशाही के स्तर पर तय होती है।
इन सबके बावजूद SC,ST और OBC के अल्प प्रतिनिधित्व के कारण केन्द्रीय और क्षेत्रीय ढांचागत प्रणाली और आर्थिक संसाधनों के विभिन्न सेक्टरों या शैक्षिक क्षेत्रों और रोजगार संसाधनों के संचालन के शीर्ष व्यवस्था में यहां पहले से मौजूद उच्च वर्ग के लोगों में अपने जातिगत सहानुभूति विचारों के कारण विभिन्न परीक्षाओं, साक्षात्कार प्रणाली में भेदभाव होता है। हालांकि यह भेदभाव इतना दृष्टिगोचर नहीं होता लेकिन लम्बे समय में उच्च स्तर की व्यवस्था में निम्न वर्ग के प्रतिनिधत्व और प्रगति में बड़ी बाधा के रूप में सामने आ रहा हैं। यह भेदभाव केवल जातिगत ही नही बल्कि भाई-भतीजावाद के साथ साथ यह आर्थिक वर्ग के दृष्टिकोण से भी होता है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और उच्च शिक्षा की शीर्ष प्रशासनिक व शैक्षणिक व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से सवर्ण (General Category) जातियों का वर्चस्व रहा है। हालिया यूजीसी रेगुलेशन 2026 के संदर्भ में, इन नियमों के कड़े विरोध के पीछे सवर्ण वर्ग द्वारा अपने पारंपरिक प्रभाव को कम होते देखने की आशंका प्रमुख है, क्योंकि नए नियमों में ओबीसी (OBC) और अन्य वंचित वर्गों को अधिक प्रतिनिधित्व और सुरक्षा दी गई है। हालांकि यह उच्च वर्ग के लोग उच्च पदों पर रहकर अपने लोगों को सीधा फायदा तो नहीं पहुंचा सकतें हैं। लेकिन उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति के आधार पर SC, ST, और OBC के छात्रों व शिक्षकों के साथ भेदभाव (अनुचित व्यवहार) एक प्रमुख समस्या है। जिसका समाधान जरूरी है। आंकड़ों के अनुसार, उच्च शिक्षण संस्थानों के शीर्ष पदों पर सवर्ण जातियों का दबदबा है, जिससे नीति-निर्माण में वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व कम हो जाता है।
आरक्षण की बात करें तो आरक्षण का फायदा उठाकर मध्यम वर्ग में शामिल हुए पिछले लोग उन गरीब स्वर्णों के आंखों में खटकने लगे हैं इसलिए अधिकतर स्वर्ण पिछड़े आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग कर रहे हैं हालांकि उनकी मांग भी वाजिब है लेकिन स्वर्ण वर्ग के अभावग्रस्त लोगों को यह समझना चाहिए कि आरक्षण के वावजूद आपके ही सक्षम लोग जो अभी अभिजात्य वर्ग में प्रवेश कर देश की शीर्ष व्यवस्था में बने रहकर आरक्षित वर्ग ,,(SC,ST,OBC) के उस प्रत्याशित प्रतिनिधित्व को प्राप्त करने में बाधक बन रहें तो UGC बिल ही नहीं ऐसे भेदभाव को रोकने के लिए हर क्षेत्र में निम्न वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले कानून बनने चाहिए।
स्वर्ण वर्ग जो नीचले पायदान पर है उनकी आर्थिक स्थिति भी दलितों और पिछड़ों के समान ही है लेकिन आज भी उस स्थिति में दलितों और निम्न वर्ग के लोगों द्वारा उन निम्न आर्थिक स्तर के स्वर्णों द्वारा पारम्परिक जातिगत भेदभाव किया जाता है। सरकारी विभागों के कार्यस्थलों पर आज SC,ST के लोगों की स्थति बेहतर नहीं है उनके साथ आए दिन विभागीय भेदभाव तथा शिक्षा और उच्च संस्थाओं की नौकरशाही की पहुंच में इन निम्न वर्गों के विद्यार्थियों के साथ संस्थागत प्रणाली से सुनियोजित भेदभाव होता है तथा उन्हें वंचित रखने की साजिशें होती है।
इसलिए UGC कानून के विरोध की लहर उच्च स्तर के स्वर्ण बुद्धिजीवियों से शुरू हुई क्योंकि वे लोग इस भेदभाव की असलियत को भली-भांति जानते हैं। हालांकि मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग के स्वर्ण इस बिल का विरोध अज्ञानता के साथ केवल देश की शीर्ष संस्थाओं में काबिज उन सक्षम लोगों के बरगलाने पर कर रहें हैं। जबकि निम्न वर्गीय स्वर्ण वर्ग का उच्च स्तर पर खास प्रतिनिधित्व भी नहीं है। लेकिन विरोध करना भी स्वाभाविक है क्योंकि इस भेदभाव से उन स्वर्णों को और उनके शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विद्यार्थियों को फायदा होता है क्योंकि इन्हें किसी न किसी प्रकार से अनैतिक रूप से अवसरों का फायदा मिलता है।
लेकिन यह कोई आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधत्व और फायदे की बात नहीं है क्योंकि भेदभाव आखिर किसी भी रूप में हो वो हमेशा अनैतिक और गैरकानूनी होता है।
इसलिए इस कानून को संशोधित रूप से लागू करने के साथ साथ वर्तमान व्यवस्था में बने आर्थिक आधार के अमीर गरीब वर्गों के बीच के भेदभाव को खत्म करना तथा किसी भी जाति के पिछड़े व्यक्ति को अवसरों की समानता बिना किसी भेदभाव से मिले यह भविष्य की सबसे बड़ी मांग होगी।
जब हमनें स्वीकार लिया है कि उच्च स्तर की व्यवस्था में ST,SC और OBC का प्रत्याशित प्रतिनिधित्व नहीं है इनके साथ अवसरों की समता में भेदभाव होता है तो फिर UGC कानून 2026 को लागू होने में बाधा नहीं होनी चाहिए। किसी कानून का दुरूपयोग की बात आधारहीन होती है क्योंकि किसी कानून का दुरूपयोग तभी होता है जब हमारे पूरे सिस्टम में नैतिकता और मानवीय मूल्यों की कमी होती है।
कितनी विडम्बना है कि आंकड़ों के अनुसार, 85% जनसंख्या (SC/ST/OBC) होने के बावजूद सत्ता और प्रशासनिक पदों पर इनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, जिसे UGC नियम दुरुस्त करना चाहते हैं।
वर्तमान में उच्च शिक्षा संस्थानों में SC, ST, और OBC के कम प्रतिनिधित्व और जाति-आधारित भेदभाव (75% छात्र प्रभावित) को देखते हुए, नए UGC नियमों का लागू होना अत्यंत आवश्यक है। यह कानून समान अवसर सुनिश्चित करने, भेदभाव को रोकने और 49.5% आरक्षण व्यवस्था को सख्ती से लागू करने हेतु जवाबदेही स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
दूसरी तरफ ऐसे कानून औपचारिक साबित होते हैं क्योंकि आजादी के बाद एक लम्बे समय में स्वर्ण वर्ग के धनाढ्य वर्ग तथा बुद्धिजीवी नौकरशाहों ने शीर्ष स्तर की व्यवस्था चाहें नौकरशाही हों, न्यायिक हों आर्थिक या संगठनात्मक संरचना की हों, या सार्वजनिक क्षेत्रों के जुड़े सभी क्षेत्रों में अपना स्थाई वर्चस्व क़ायम किया है। कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए पहले से ही भौतिक और संरचनात्मक रूप से कब्जा जमा हुए है जिसे कम करने के लिए UGC जैसे एक्ट मात्र एक चेतावनी और पहल का काम कर सकती हैं।
इस विशेष वर्ग का प्रतिनिधित्व हर क्षेत्र में ज्यादा है ऐसे कानून इन्हें कोई खास नुक़सान नहीं पहुंचायेंगे उदाहरण के लिए न्यायिक संस्थाओं में पूर्ण प्रतिनिधित्व, सरकारी निजी संस्थानों तथा व्यवसायिक प्रतिष्ठानों से जुड़े क्षेत्रों का मालिकाना हो आदि इस प्रकार कुल मिलाकर निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों से जुड़े भौतिक संसाधनो पर भी प्रभुत्व है । तो ऐसे में यह कानून मध्यम और निम्न वर्ग के स्तर पर केवल भेदभाव कम कर सकता है।
अस्वीकार- यह लेख केवल मौजूदा व्यवस्था और आंकड़े के आधार पर एक विश्लेषण है। इस लेख के तथ्यों में त्रुटि हो सकती है इसलिए इस लेख की सामग्री को कानूनी और वैधानिक रूप से विवाद योग्य नहीं माना जाए। यह लेख केवल भारतीय आर्थिक सामाजिक व्यवस्था और इतिहास से जुड़े तथ्यों का विश्लेषणात्मक अध्ययन है। इस लेख का उद्देश्य किसी धर्म जाति वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है।

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