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Sunday, June 6, 2021

ब्रह्माण्ड में जीवन की तालाश: नासा मिशन शुक्र की तैयारी में, उठेंगे कई रहस्यों से पर्दे

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शुक्र ग्रह मिशन के लिए नासा कर रहा है तैयारी प्रतिकात्मक फोटो



मानव जाति बुद्धिजीवी होने के साथ साथ जिज्ञासु रही है पृथ्वी पर जीवन की जानकारी हो या ब्रह्मांड के रहस्यों को जानकारी विश्व के वैज्ञानिक हमेशा नई-नई खोजें करते आये है। पृथ्वी की कक्षा हो या पृथ्वी से सूदूर चन्द्रमा तथा मंगल ग्रह पर जीवन तलाशने में भी खगोलशास्त्रियों और वैज्ञानिकों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है । नासा जैसी अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी ने वायजर जैसे मिशन भी भेज दिए हैं जो आज हमारे सौरमंडल को पार कर चुके हैं लेकिन जिज्ञासा अभी बनी हुई है कि यह विशाल ब्रह्माण्ड आखिर कितना अद्भुत है? क्या इस ब्रह्माण्ड में किसी भी ग्रह पर पृथ्वी जैसे प्राणी है या कहीं पर जीवन की उचित परिस्थितियां मौजूद है? इन्हीं सवालों और नवीन तथ्यों के लिए नासा सहित अन्य देशों की विभिन्न अन्तरिक्ष ऐजेन्सियां हर वर्ष करोड़ों खर्च करती है। भारत का मंगलयान हो या चन्द्रयान आदि सभी प्रयास बहुत महत्वाकांक्षी थे। मानव भी किसी से कम नहीं अन्तरिक्ष स्टेशन जैसी अद्भुत मशीनों तथा हजारों उपग्रहों को भी पृथ्वी की कक्षा में छोड़ चुकी है मानव जाति की सबसे बड़ी छलांग चन्द्रमा पर मानव भेजने की थी जो कि सफल रही थी। चन्द्रमा,मंगल मिशन के बाद अब अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा शुक्र ग्रह के लिए नये मिशन की योजना बना रही है। बीते 30 साल में शुक्र के लिए उसका यह पहला मिशन होगा। न्युज एजेन्सीज के मुताबिक खबरें आ रही है कि शुक्र ग्रह के लिए दो मिशन की तैयारी जल्द शुरू होगी जिसमें एक द विंची प्लस और वैरिटाज नाम के दो प्रोजेक्ट्स पर विचार किया जा रहा है। इन नवीन मिशन की बात सुनकर हमारे जहन में सवाल उठता होगा कि आखिर यह मिशन क्यों शुरू किए जा रहे हैं? आखिर शुक्र ग्रह कैसा है वहां का वातावरण कैसा है? कितना तापमान है? आइए समझने की कोशिश करते हैं कि पिछले मिशन की जानकारी तथा वैज्ञानिकों के अनुमानों के आधार शुक्र ग्रह की सतह और वायुमंडल की परिस्थितियां कैसी है? क्या वहां मानव निर्मित कोई वस्तु पहुंच सकती है?

कैसा है शुक्र ग्रह का वातावरण और सतही स्वरूप


वैज्ञानिकों के अध्ययनों से पता चलता है कि पृथ्वी और शुक्र दोनों का आकार, द्रव्यमान , संरचना लगभग एक जैसे हैं। इसलिए शुक्र ग्रह को पृथ्वी का जुड़वां ग्रह कहा जाता है। पृथ्वी से दिखाई देने वाले ब्रह्माण्ड में चन्द्रमा के बाद सबसे चमकीली वस्तु शुक्र ग्रह है। हमारे सौर मंडल में क्रम के अनुसार बुध ग्रह के बाद शुक्र दूसरा ग्रह है जो सूर्य के नजदीक है। हमारी पृथ्वी शुक्र के बाद तीसरे नम्बर पर है। तापमान की बात करें तो बुथ का तापमान सबसे अधिक होना चाहिए लेकिन यहां विपरीत है शुक्र ग्रह का तापमान सबसे अधिक माना जाता है क्योंकि बुध का सूर्य के इतने क़रीब होने की वजह से उसका वायुमंडल नष्ट हो चुका है। इसलिए सुर्य की किरणे परावर्तित हो जाती है लेकिन शुक्र का वायुमंडल होने के कारण शुक्र पर पड़ने वाली सूर्य की गर्मी वापिस लौट नहीं सकती इसलिए वह गर्मी का गोला बन गया है। शुक्र ग्रह के वायुमंडल में मुख्य रूप से कॉर्बनडाइऑक्साइड है जो एक तरफ़ा रास्ते का काम करता है। सूरज की गर्मी इसमें प्रवेश तो करती है लेकिन निकल नहीं सकती।इस तरह से ये एक गर्म भट्टी जैसा है। शुक्र की सतह का तापमान लगभग 462 डिग्री सैल्सियस रहता है। हम पृथ्वी से शुक्र ग्रह को आसानी से देख सकते हैं सुबह के समय पूर्व दिशा में जो सबसे चमकदार तारा दिखाई देता है वो शुक्र ग्रह है। यह शाम को भी स्पष्ट दिखाई देता है। शुक्र ग्रह के वातावरण में 96% कार्बन डाइऑक्साइड है। इस ग्रह पर वायुमंडलीय दबाव पृथ्वी के मुक़ाबले 90 गुणा ज़्यादा है।
इसलिए शुक्र ग्रह पर जीवन की संभावना कम ही बनती है क्योंकि सौ से अधिक ताप पर पानी उबलने लगता है इस प्रकार अगर धरती का कोई प्राणी शुक्र ग्रह पर उतरता है तो कुछ ही सेकेंड में उबलने लग जाएगा। इसलिए अगर शुक्र पर जीवन होता भी है तो वो हम 50 किलोमीटर ऊपर मिलने की ही उम्मीद कर सकते हैं। वो भी सूक्ष्म जीव या वायरस हो सकते हैं।


नासा के मिशन जगेगी नई उम्मीदें 


हाल ही में लम्बे समय बाद शुक्र ग्रह के लिए नासा ने नई उम्मीदें जगाई है जिसमें उन्होंने दो बड़े मिशन की बात कही है। अगर यह मिशन सक्सेस होते हैं तो शुक्र ग्रह के वातावरण के रहस्य खुलेंगे जो भविष्य में पृथ्वी के वायुमंडल से जुड़ी गतिविधियां के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलेगी। समाचार एजेंसियों के मुताबिक नासा के सौरमंडल खोज कार्यक्रम की ओर से हाल में की गई घोषणा में दो मिशनों को हरी झंडी दी गई है और ये दोनों मिशन शुक्र ग्रह के लिए हैं। इन दो महत्वाकांक्षी मिशनों को 2028 से 2030 के बीच शुरू किया जाएगा। वर्ष 1990 के बाद से शुक्र ग्रह तक किसी मिशन को नहीं भेजा है । इसलिए लम्बे समय बाद शुक्र ग्रह की तरफ किया गया रूख सौर मंडल के पिछले सभी अध्ययनों में बहुत महत्वपूर्ण होगा। पिछले कुछ समय से कई वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि शुक्र ग्रह के बादलों में सूक्ष्म जीव हो सकते हैं। यहां तापमान जीवन के लिए अनुकूल है और फॉस्फाइन तत्व होने का अनुमान भी लगाया जा रहा है जो जीवन की मौजूदगी में ही संभव है। यह फास्फाइन तत्व किसी जीव की उत्पत्ति की और इंगित करता है जो पृथ्वी पर मौजूद कुछ जीवों में पाया गया है।

वेनेरा,मेरिनर ,वेगास तथा पायनियर वीनस परियोजनाएं


शुक्र के लिए पहला रोबोटिक अन्तरिक्ष यान मिशन, 12 फ़रवरी 1961 को वेनेरा 1 यान के प्रक्षेपण के साथ आरंभ हुआ। सोवियत वेनेरा कार्यक्रम अन्तर्गत यह पहला यान था। वेनेरा 1 ने मिशन के सातवे दिन सम्पर्क खो दिया, तब वह पृथ्वी से 20 लाख किमी की दूरी पर था।
इसके साथ-साथ शुक्र ग्रह का पीछा नहीं छोड़ा तथा विभिन्न देशों ने अपने मिशनों को पुनः परिष्कृत करके भेजते रहते जो आखिर शुक्र के घने बादलों के आवरण को भेदने में कामयाब हुए लेकिन गर्म सतह पर वायुमंडलीय दवाव के कारण कोई वस्तु नहीं टिक पाई। इस प्रकार शुक्र ग्रह के पूर्व मिशनों में अमेरिका के मेरिनर शृंखला के अभियान 1962-1974, तथा वर्ष 1978 में पायनियर वीनस 1 और पायनियर वीनस 2, 1989 में मैगलन थे। 


वहीं रूस अंतरिक्ष अनुसंधान के मामले में पीछे कहां रहने वाला रूस ने अंतरिक्षयान की वेनेरा शृंखला 1967-1983 तथा वर्ष 1985 में वेगास 1 और 2 भेजें। अमेरिका और रूस के बाद जापान ने वर्ष 2015 में अकात्सुकी मिशन भेजा वहीं यूरोपीय देशों में वर्ष 2005 में वीनस एक्सप्रेस मिशन भी शामिल है। यह यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का पहला वीनस एक्सप्लोरेशन मिशन था।भारत की बात करें तो भारत ने वर्ष 2024 में शुक्रयान नामक एक नया ऑर्बिटर लॉन्च करने की योजना बना रहा है। सोवियत वेनेरा 3 यान 1 मार्च 1966 को शुक्र पर उतरते वक्त दुर्घटनाग्रस्त हो गया था लेकिन वायुमंडल मे प्रवेश करने वाली यह पहली मानव-निर्मित वस्तु थी। इसके बाद विफल रहे सभी अभियानों ने शुक्र के बारे में विभिन्न प्रकार से जानकारी प्रदान की जिससे आज हम दावा कर सकते हैं कि शुक्र ग्रह की विशेषता पृथ्वी से कितनी भिन्न है। इस प्रकार वेनेरा के 15 व 16 वे अभियान तक शुक्र ग्रह के बारे में काफी कुछ जानकारी मिल गई थी।


अन्तरिक्ष मिशन में शुक्र की राह में है बड़ी मुश्किलें


शुक्र ग्रह पर परिस्थितियां प्रतिकूल और खतरनाक हैं। गर्म सतह के साथ साथ इसके वातावरण में सल्फरिक एसिड है और सतह का तापमान इतना गर्म है कि सीसा पिघल सकता है। लेकिन यह हमेशा से ऐसा नहीं रहा है। ऐसा माना जाता है कि शुक्र ग्रह की उत्पत्ति बिलकुल धरती की उत्पत्ति के समान हुई थी। तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि वहां की परिस्थितियां धरती के विपरीत हो गईं? धरती पर, कार्बन मुख्यत: पत्थरों के भीतर मुख्य रूप से फंसी हुआ है जबकि शुक्र ग्रह पर यह वातावरण में चला गया जिससे इसके वातावरण में तकरीबन 96 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड है। इससे बहुत ही तेज ग्रीनहाउस प्रभाव उत्पन्न हुआ जिससे सतह का तापमान 750 केल्विन (470 डिग्री सेल्सियस या 900 डिग्री फारेनहाइट) तक चला गया है। शुक्र ग्रह पर वायुमंडलीय दबाव तथा ग्रीन हाउस प्रभाव से बना भट्टीनुमा वातावरण मानव-निर्मित किसी भी वस्तु को इसकी सतह पर स्थापित नहीं होने देता इसलिए
शुक्र तक अब तक गए मिशन योजना के मुताबिक नहीं रहे हैं। हालांकि इसकी सतह को देखने में कामयाबी जरूर मिली है। शुक्र ग्रह के बादलों के आवरण को महत्व दिया जा रहा है क्योंकि यहां की दशा शोध हेतु उपयुक्त है। लेकिन शुक्र ग्रह की सतह पर किसी उपकरण को लम्बे समय तक रखना अभी तक चुनौती बना हुआ है।


यह होंगे नासा के शुक्र ग्रह के लिए दो मिशन


हाल ही में नासा ने शुक्र ग्रह के लिए दो महत्वकांक्षी मिशन तैयार करने की बात कही है उनकी घोषणा के मुताबिक शुक्र ग्रह के लिए दो महत्वपूर्ण मिशन होंगे जिनका नाम दाविंची प्लस तथा वेरिटास रखा है ‌

 दाविंची प्लस 


नासा का पहला मिशन दाविंची प्लस के नाम से जाना जाएगा। इसमें एक जांच उपकरण शामिल शामिल हैं जो कि वायुमंडल में छोड़ा जाएगा यह जैसे-जैसे वायुमंडल से गुजरेगा माप लेकर आंकड़े जुटाएगा।। इस अन्वेषण के तीन चरण होंगे जिसके पहले चरण में पूरे वायुमंडल की जांच की जाएगी। इसमें विस्तार से वायुमंडल की संरचना को देखा जाएगा जो बढ़ते सफर के दौरान प्रत्येक सतह पर सूचनाएं उपलब्ध कराएगा।

वेरिटास 


दूसरा मिशन 'वेरिटास' के नाम से जाना जाएगा जो 'वीनस एमिशिविटी' , 'रेडियो साइंस', इनसार', 'टोपोग्राफी' और स्पेक्ट्रोस्कोपी' का संक्षिप्त रूप है। यह और ऊंचे मानक वाला ग्रह मिशन होगा। ऑर्बिटर अपने साथ दो उपकरण ले जाएगा जिनकी मदद से सतह का मानचित्र तैयार किया जाएगा और दाविंची से मिले विस्तृत इन्फ्रारेड अवलोकनों का पूरा होगा। इसके पहले चरण में विभिन्न रेडियो तरंगों की सीमाओं को देखने वाला कैमरा स्तेमाल होगा। यह शुक्र ग्रह के बादलों के पार तक देख सकता है जिससे वायुमंडलीय एवं मैदानी संरचना की जांच हो सकेगी।
इसी मिशन में भेजा जाने वाला दूसरा उपकरण रडार तकनीक पर आधारित होगा जो पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों पर अत्यधिक इस्तेमाल होने वाली तकनीक का प्रयोग करेगा। हाई रेजोल्यूशन वाली रडार छवियां और अधिक विस्तृत मानचित्र पैदा करेगा जो शुक्र के सतह की उत्पत्ति की जांच करेगी। इन मिशनों से उस सिद्धांत की पुख्ता पृष्ठभूमि तैयार होगी जिसमें माना जाता है कि शुक्र की सतह पूरी तरह पिघल गई थी और पचास करोड़ साल पहले फिर से अस्तित्व में आयी । इस प्रकार इन नवीन मिशनों की सफलता से पृथ्वी की सिस्टर मानी जाने वाली शुक के बारे में रोचक जानकारी मिलेगी जो पृथ्वी पर बदलती जलवायु को नियंत्रित करने में काफी मददगार साबित हो सकती है। साथ ही इस ग्रह के इतिहास तथा ग्रीनहाउस प्रभाव को पढ़ने और धरती पर इसका प्रबंधन कैसे किया जाए, यह समझने का बेहतरीन मौका उपलब्ध कराएगा। इसके लिए ऐसे मॉडलों का इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें शुक्र के वायुमंडल की चरम स्थितियों को तैयार किया जा सकता है और परिणामों की तुलना धरती पर मौजूदा स्थितियों से कर सकते हैं।


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