ये त्यौहार ।
इसी बहाने हो जाता हैं
प्रीति प्रेम अपनों से इजहार।
इन उम्मीदों से लगती रेढी
किसी गरीब के घर लग जाता हैं
फांकों का अंबार।
लौट कर आते हैं मुफलिसी के
देशावर!
तनिक होता उनको फूर्सत का अहसास!
मानो न मानो कुछ कहते हैं ये त्यौहार!.....
टुटे रिश्ते जुडते हैं अपनों से अपने मिलते हैं।
जब बंटते है विश्वासी उपहार!
सुनो तो कुछ आवाज हैं मिलजुल कर रहने की
इसी लिए लौट कर आते हैं ये उत्सव ओ त्यौहार!
माना कि काल्पित और भिन्न भिन्न हैं
बस खुशियां मिलती बच्चों के संग जब बुड्ढों को भी
ग़म डुबोकर प्रसन्नता के गोते लगवाते हैं ये त्योहार!
किसी धर्म जाति से मत बांधो इनको
पाखंडता से परे होकर
जैसे ही मनाओ इनको
नहीं शिकायत इनको, बस है यह छोटे मासुम से त्यौहार!
बच्चे क्या जाने ईद दीवाली....
मिल जाये उनको सौगात मिठाई की
बस खुशियां मिलती उनको.. वो ही
पैगाम लाते हैं ये त्यौहार!
मन कहे तो मन से मना लेना
द्वेष ईर्ष्या न रखकर
खुश रहना ए मानव मेरे
हर दिन होगा बस ऐसा त्यौहार!

सुन्दर
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