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| कविता |
कौन है यह चितेरा?
कैसे यह दृश्य उकेरा?
किन रंगों को घोला
किस पृष्ठभूमि पर उतारा
कैसा अजनबी है यह चितेरा?
लगता हैं बहुत मोहक
प्रकृति का है यह रूप सुनहरा
चिपका इसको क्षितिज पे
छिप गया हैं कोई बनजारा।
दे गया मृत्युलोक पे
प्रित प्रेरित नजारा।
कितने रंग किये मिश्रण इनमे
जीवन उमंग का रंग भरके ,,,,
उस खुदा ने ही कुछ तलक निहारा,,,,,,
देखी कृति प्रकृति की जिसने
वो कभी हयात ए जंग नहीं हारा।
नहीं हुआ हूं ओझल, में पूर्ण अभी
मेघ गिरफ्त से भानू ने ललकारा
सब्र रखो ओ! हारे मानव
तनिक बदलुंगा इस कलिमा को
उसी लालिमा से , विलुप्त नहीं हैं स्वभावी उजियारा।
बखान किया इस कवि ने ओ चितेरे
कविता संग तन मन धन भी वारा।

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