Euthanasia इच्छा मृत्यु के दो केसों का विश्लेषण हरीश राणा, अरुणा शानबाग: क्या है भारत और अन्य देशों के कानून? सक्रिय और निष्क्रिय इच्छा मृत्यु Jagriti PathJagriti Path

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Saturday, March 21, 2026

Euthanasia इच्छा मृत्यु के दो केसों का विश्लेषण हरीश राणा, अरुणा शानबाग: क्या है भारत और अन्य देशों के कानून? सक्रिय और निष्क्रिय इच्छा मृत्यु

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What is euthanasia 



Euthanasia क्या है इच्छा मृत्यु का मुद्दा?


जब कोई व्यक्ति गंभीर बिमारी या ऐसी पूर्ण लकवे या अपाहिजता में जीवन भर रहता है दर्द में तड़पता है तो उसे या उसके परिजनों को लगता है कि वह बिना दर्द के मृत्यु को प्राप्त हो जाएं। लेकिन हमें समझना जरूरी है कि जीवन हमारा प्राकृतिक अधिकार है ऐसे में किसी भी परिस्थिति में किसी का जीवन समाप्त करना पेंचिदा मामला है। भारत के संविधान में जीवन का अधिकार मौलिक अधिकार है ऐसे में जीवन समाप्त करना अपने आप में गंभीर मामला है। इसलिए भारतीय न्याय व्यवस्था में किसी व्यक्ति को केमिकल के सीधे इंजेक्शन देकर आरामदायक मृत्यु देना सुनने में आसान है लेकिन इसकी अनुमति देना खतरों से खाली नहीं है। विदेशों की तरहां भारत में इस प्रकार से अनुमति अभी तक नहीं दी गई इसके पीछे सबसे बड़ा कारण इस प्रकार के ड्रग्स का मिसयूज तथा भविष्य में ऐसे किसी केस में किसी कानूनी कमजोर कड़ी से मामला गंभीर हो सकता है। दूसरी तरफ़ भारतीय न्याय व्यवस्था अप्राकृतिक मौत को नैतिक रूप से स्वीकार नहीं करता है। इस दो मामलों में न्यायपालिका ने लम्बी कानूनी प्रक्रिया से गुजरते हुए निष्क्रिय (Passive Euthanasia) इच्छा मृत्यु की अनुमति दी। भारत में इच्छा मृत्यु के पक्ष विपक्ष में दो धड़े है जिसमें लोगों का मानना है कि इच्छा मृत्यु आसान होनी चाहिए वहीं एक पक्ष का मानना है कि इस कानून और प्रकिया का भविष्य में दुरूपयोग हो सकता है। आइए विस्तार से समझते हैं इच्छा मृत्यु का कांसेप्ट और भारत में दो बहुचर्चित केस-

क्या है इच्छा मृत्यु का कांसेप्ट यह कितने प्रकार की होती है?


इच्छा मृत्यु, जिसे अंग्रेज़ी में Euthanasia कहा जाता है, का शाब्दिक अर्थ है “अच्छी या शांतिपूर्ण मृत्यु।” यह वह स्थिति होती है जब किसी असाध्य बीमारी या अत्यधिक पीड़ा से ग्रस्त व्यक्ति को उसकी इच्छा से या उसकी भलाई के लिए जीवन समाप्त करने में सहायता दी जाती है। यह विषय चिकित्सा, कानून, नैतिकता और मानवाधिकारों के बीच गहराई से जुड़ा हुआ है।

इच्छा मृत्यु मुख्यतः दो प्रकार की होती है सक्रिय व निष्क्रिय


सक्रिय (Active Euthanasia) और निष्क्रिय (Passive Euthanasia)। सक्रिय इच्छा मृत्यु में डॉक्टर द्वारा सीधे किसी दवा या इंजेक्शन के माध्यम से जीवन समाप्त किया जाता है, जबकि निष्क्रिय इच्छा मृत्यु में जीवन को बनाए रखने वाले उपकरण (जैसे वेंटिलेटर) हटा दिए जाते हैं या उपचार बंद कर दिया जाता है।
भारत सहित कई देशों में सक्रिय इच्छा मृत्यु अवैध है, क्योंकि इसे हत्या के समान माना जाता है। वहीं, कुछ परिस्थितियों में निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को मान्यता दी गई है, खासकर जब मरीज की स्थिति पूरी तरह निराशाजनक हो और उसके ठीक होने की कोई संभावना न हो।


क्या इच्छा मृत्यु का कानून भारत बनाम अन्य देश

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Type of euthanasia


इच्छा मृत्यु (Euthanasia) आधुनिक चिकित्सा, नैतिकता और कानून के बीच एक जटिल तथा संवेदनशील विषय है। इसका अर्थ है—किसी असाध्य रोग से पीड़ित व्यक्ति को उसकी पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए जानबूझकर जीवन का अंत करना। सामान्यतः इसे दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है—सक्रिय (Active) और निष्क्रिय (Passive) इच्छा मृत्यु। सक्रिय इच्छा मृत्यु में किसी दवा या इंजेक्शन के माध्यम से सीधे जीवन समाप्त किया जाता है, जबकि निष्क्रिय इच्छा मृत्यु में जीवनरक्षक उपकरणों या उपचार को हटाकर प्राकृतिक मृत्यु को होने दिया जाता है। विश्वभर में इस विषय पर कानून अलग-अलग हैं, जो प्रत्येक देश की सामाजिक, धार्मिक और नैतिक मान्यताओं को दर्शाते हैं।
भारत में इच्छा मृत्यु का विषय लंबे समय तक विवादित रहा। यहाँ सक्रिय इच्छा मृत्यु पूरी तरह अवैध मानी जाती है और इसे भारतीय दंड संहिता के तहत हत्या या आत्महत्या के लिए उकसाने के समान माना जाता है। हालांकि, निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को कुछ शर्तों के साथ वैधता प्राप्त है। वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने “अरुणा शानबाग केस” में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को सीमित परिस्थितियों में अनुमति दी। अरुणा शानबाग, जो कई वर्षों तक कोमा में रहीं, उनके मामले ने पूरे देश में इस मुद्दे पर बहस छेड़ दी थी। इसके बाद 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने “लिविंग विल” (Living Will) या “एडवांस डायरेक्टिव” को मान्यता दी, जिसके तहत कोई व्यक्ति पहले से लिखकर यह निर्देश दे सकता है कि गंभीर स्थिति में उसे जीवनरक्षक उपचार दिया जाए या नहीं।
भारत में इस कानून के तहत यह आवश्यक है कि इच्छा मृत्यु का निर्णय केवल रोगी या उसके परिवार की इच्छा से ही नहीं, बल्कि एक चिकित्सा बोर्ड और न्यायिक प्रक्रिया की स्वीकृति से ही लिया जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी प्रकार का दुरुपयोग न हो और रोगी के अधिकारों की रक्षा हो सके। भारतीय समाज में धार्मिक मान्यताएँ भी इस विषय को प्रभावित करती हैं, जहाँ जीवन को ईश्वर का दिया हुआ माना जाता है और उसे समाप्त करना नैतिक रूप से गलत समझा जाता है।
विदेशों में इच्छा मृत्यु के कानून अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट और विविध हैं। कुछ देशों में सक्रिय इच्छा मृत्यु भी वैध है। उदाहरण के लिए, नीदरलैंड (Netherlands) और बेल्जियम (Belgium) ऐसे देश हैं जहाँ सख्त शर्तों के तहत सक्रिय इच्छा मृत्यु की अनुमति है। इन देशों में यह सुनिश्चित किया जाता है कि रोगी असाध्य बीमारी से पीड़ित हो, असहनीय दर्द में हो और उसने स्वेच्छा से यह निर्णय लिया हो। साथ ही, डॉक्टरों को भी कई स्तरों पर जांच करनी होती है।
स्विट्जरलैंड (Switzerland) में एक अलग प्रकार की व्यवस्था है, जहाँ “सहायता प्राप्त आत्महत्या” (Assisted Suicide) कानूनी है, बशर्ते कि इसमें कोई स्वार्थ न हो। यहाँ कई संगठन इस प्रक्रिया में सहायता करते हैं, जिससे दुनिया भर के लोग भी वहाँ जाकर इस विकल्प का उपयोग करते हैं। इसी तरह, कनाडा (Canada) और अमेरिका (United States) के कुछ राज्यों—जैसे ओरेगन (Oregon) और कैलिफोर्निया (California)—में “मेडिकल असिस्टेड डाइंग” (Medical Assistance in Dying) को वैधता दी गई है।
हालांकि, सभी देश इस विषय पर सहमत नहीं हैं। कई देशों में इच्छा मृत्यु पूरी तरह प्रतिबंधित है, विशेषकर वे देश जहाँ धार्मिक प्रभाव अधिक है, जैसे अधिकांश मुस्लिम देश। वहाँ इसे जीवन के खिलाफ अपराध माना जाता है। वहीं, जापान (Japan) और चीन (China) जैसे देशों में इस विषय पर स्पष्ट कानून नहीं है, जिससे यह एक ग्रे एरिया बना हुआ है।
इच्छा मृत्यु के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि यह व्यक्ति को गरिमा के साथ मरने का अधिकार देता है। जब कोई व्यक्ति असहनीय दर्द और असाध्य बीमारी से गुजर रहा हो, तब उसे अपनी मृत्यु के बारे में निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। यह मानव अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा माना जाता है। इसके अलावा, यह परिवार और स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ने वाले मानसिक और आर्थिक बोझ को भी कम कर सकता है।
वहीं, इसके विरोध में यह कहा जाता है कि यह जीवन के मूल्य को कम करता है और इसके दुरुपयोग की संभावना अधिक होती है। कई बार परिवार या समाज के दबाव में व्यक्ति यह निर्णय ले सकता है। डॉक्टरों की नैतिक जिम्मेदारी भी इसमें सवालों के घेरे में आती है, क्योंकि उनका कार्य जीवन बचाना है, न कि उसे समाप्त करना। इसके अलावा, यदि यह व्यापक रूप से स्वीकार कर लिया जाए, तो कमजोर और वृद्ध वर्ग के लोग असुरक्षित महसूस कर सकते हैं।
इस प्रकार, भारत और विदेशों में इच्छा मृत्यु के कानून अलग-अलग सामाजिक और नैतिक दृष्टिकोणों का प्रतिबिंब हैं। भारत ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है, जहाँ निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को सीमित अनुमति दी गई है, जबकि सक्रिय इच्छा मृत्यु पर प्रतिबंध कायम है। भविष्य में चिकित्सा तकनीक और सामाजिक सोच में बदलाव के साथ इस विषय पर और भी व्यापक चर्चा और कानूनी सुधार संभव हैं। अंततः, यह एक ऐसा विषय है जिसमें मानव संवेदनाएँ, अधिकार और नैतिकता सभी एक साथ जुड़े हुए हैं, इसलिए किसी भी निर्णय में संतुलन और सावधानी अत्यंत आवश्यक है।

केस नं.1 इच्छा मृत्यु और अरुणा शानबाग का मामला


अरुणा शानबाग का बहुचर्चित केस था जो इच्छा मृत्यु से सम्बंधित था । यह भारत में पहली इच्छा मृत्यु की अनुमति थी। अरुणा शानबाग भारत में सबसे अधिक समय तक कोमा में रहने वाली महिला थी जो यौन उत्पीडन और हमले का शिकार हुई थी। हालांकि अपराधी को 7 साल की जेल हुई थी क्योंकि बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई अपराधी ने उसका गला घोंटा था जिसमें मस्तिष्क में आक्सीजन की आपूर्ति बाधित होने से वह हमेशा के लिए अचेत अवस्था में चली गई थी।

अरुणा शानबाग का जीवन और दर्दनाक घटना


अरुणा शानबाग एक भारतीय नर्स थीं, जो मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल (KEM) अस्पताल में कार्यरत थीं। 27 नवंबर 1973 को उनके साथ एक अत्यंत क्रूर और अमानवीय घटना हुई। अस्पताल के ही एक वार्ड बॉय ने उनके साथ यौन उत्पीड़न किया और उन्हें कुत्ते की चेन से गला घोंटकर गंभीर रूप से घायल कर दिया।
इस हमले के कारण उनके मस्तिष्क को भारी क्षति पहुँची और वे “Persistent Vegetative State” (PVS) में चली गईं, यानी वे जीवित तो थीं लेकिन चेतना रहित अवस्था में। वे न तो बोल सकती थीं, न चल सकती थीं, और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो गईं।
इस दर्दनाक स्थिति में अरुणा शानबाग ने लगभग 42 वर्षों तक जीवन बिताया। यह मानव सहनशक्ति, चिकित्सा सेवा और नैतिक प्रश्नों का एक अनोखा उदाहरण बन गया।

इच्छा मृत्यु की याचिका और न्यायिक प्रक्रिया

साल 2009 में, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता पिंकी विरानी ने अरुणा शानबाग की ओर से इच्छा मृत्यु की याचिका सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में दायर की। उनका तर्क था कि अरुणा की स्थिति में कोई सुधार संभव नहीं है, इसलिए उन्हें सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार मिलना चाहिए।
इस याचिका ने पूरे देश में एक बड़ी बहस छेड़ दी—क्या किसी व्यक्ति को मरने का अधिकार होना चाहिए? क्या डॉक्टर या परिजन ऐसा निर्णय ले सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया। कोर्ट ने सक्रिय इच्छा मृत्यु को अस्वीकार कर दिया, लेकिन निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी। यह निर्णय भारत में पहली बार इच्छा मृत्यु को लेकर स्पष्ट कानूनी दिशा प्रदान करता है।
हालांकि, अदालत ने अरुणा शानबाग के मामले में इच्छा मृत्यु की अनुमति नहीं दी, क्योंकि KEM अस्पताल के स्टाफ ने उनकी देखभाल जारी रखने की इच्छा जताई और उन्हें “परिवार” की तरह माना।

कानूनी और नैतिक प्रभाव


अरुणा शानबाग केस ने भारत के कानूनी और नैतिक ढांचे पर गहरा प्रभाव डाला। इस केस के बाद यह स्पष्ट हुआ कि जीवन का अधिकार केवल जीने तक सीमित नहीं है, बल्कि “सम्मानपूर्वक जीने” का अधिकार भी महत्वपूर्ण है।
बाद में, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने “लिविंग विल” (Living Will) को मान्यता दी। इसका मतलब है कि कोई व्यक्ति पहले से लिख सकता है कि यदि वह भविष्य में गंभीर स्थिति में हो जाए, तो उसे किस प्रकार का उपचार दिया जाए या न दिया जाए।
नैतिक रूप से, यह मामला कई सवाल उठाता है—
क्या जीवन केवल जीवित रहने का नाम है या चेतना और गरिमा भी जरूरी है?
क्या किसी को पीड़ा से मुक्ति देने के लिए मृत्यु देना उचित है?
डॉक्टर की भूमिका क्या होनी चाहिए—जीवन बचाना या पीड़ा समाप्त करना?
इन प्रश्नों का कोई सरल उत्तर नहीं है, और यही कारण है कि इच्छा मृत्यु का विषय आज भी विवादास्पद बना हुआ है।

मानवता, कानून और संवेदनशीलता का संतुलन
अरुणा शानबाग का मामला केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह मानवता, करुणा और कानून के बीच संतुलन का प्रतीक है। इस केस ने यह सिखाया कि चिकित्सा विज्ञान चाहे कितना भी उन्नत क्यों न हो जाए, लेकिन कुछ स्थितियों में निर्णय केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं पर आधारित होते हैं।
इच्छा मृत्यु पर बहस आज भी जारी है, और हर समाज को अपने सांस्कृतिक, नैतिक और कानूनी मूल्यों के अनुसार इसका समाधान खोजना होगा।
अंततः, यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा रहता है—
क्या हमें जीवन को हर कीमत पर बचाना चाहिए, या पीड़ा से मुक्ति को भी उतना ही महत्व देना चाहिए?
यह निबंध इस जटिल विषय को समझने का एक प्रयास है, जिसमें अरुणा शानबाग का मामला एक केंद्रीय उदाहरण के रूप में सामने आता है।


अरुणा शानबाग के साथ क्या हुआ था?


27 नवंबर 1973 को, मुंबई के KEM अस्पताल में काम करने वाली नर्स अरुणा शानबाग पर उसी अस्पताल के एक वार्ड बॉय ने हमला किया। उसने उनके साथ यौन उत्पीड़न करने की कोशिश की और उन्हें कुत्ते की चेन से गला घोंट दिया।
इस हमले के कारण उनके दिमाग को ऑक्सीजन नहीं मिल पाई, जिससे उनके मस्तिष्क को गंभीर और स्थायी क्षति पहुँची।
वे Persistent Vegetative State (PVS) में चली गईं
वे न बोल सकती थीं, न चल सकती थीं, न ही सामान्य रूप से प्रतिक्रिया दे सकती थीं वे पूरी तरह दूसरों की देखभाल पर निर्भर हो गईं थीं। उन्होंने लगभग 42 साल तक इसी अवस्था में जीवन बिताया। अस्पताल के स्टाफ ने उनकी लगातार सेवा की और उनका ध्यान रखा। उनका मामला बाद में इच्छा मृत्यु (Euthanasia) की बहस का केंद्र बना। अंततः 2015 में उनका निधन हो गया

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?


यह घटना केवल एक अपराध नहीं थी, बल्कि इसने पूरे देश में यह सवाल खड़ा किया कि—
क्या किसी व्यक्ति को असहनीय और असहाय स्थिति में “सम्मानजनक मृत्यु” का अधिकार होना चाहिए?
यही कारण है कि अरुणा शानबाग का केस आज भी कानून, नैतिकता और मानवता के संदर्भ में पढ़ा और समझा जाता ह

केस नं.2 हरीश राणा का मामला: दुर्घटना से इच्छा मृत्यु तक 



एक युवक जिसकी जिंदगी अचानक रुक गई
हरीश राणा एक सामान्य युवक थे, जो पढ़ाई कर रहे थे और अपने भविष्य के सपने देख रहे थे। लेकिन एक दुर्घटना ने उनकी पूरी जिंदगी को बदल दिया। यह मामला इसलिए खास बन गया क्योंकि यह भारत का पहला ऐसा केस बना जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने किसी व्यक्ति के लिए निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) को लागू करने की अनुमति दी।

चंडीगढ़ की दुर्घटना: जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़


साल 2013 में, जब हरीश राणा पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के पास एक हॉस्टल/पीजी में रहकर पढ़ाई कर रहे थे, तब एक दिन वे चौथी मंजिल से गिर गए। इस गिरने से उनके सिर (ब्रेन) में बेहद गंभीर चोट लगी, जिसे ट्रॉमैटिक ब्रेन इंजरी कहा जाता है। इस हादसे के बाद वे कोमा (coma) में चले गए और उनके शरीर के चारों अंग काम करना बंद कर गए (quadriplegia), तथा वे कभी होश में नहीं आए। यानी दुर्घटना के बाद उनकी जिंदगी “जीवित शरीर लेकिन बिना चेतना” वाली स्थिति में बदल गई।

13 साल तक बिस्तर पर जिंदगी


दुर्घटना के बाद हरीश राणा करीब 13 साल तक “Permanent Vegetative State (PVS)” में रहे। इस दौरान उनकी स्थिति यह थी कि वे न बोल सकते थे, न हिल सकते थे, उन्हें फीडिंग ट्यूब (PEG tube) से खाना दिया जाता था और वे पूरी तरह मशीन और परिवार पर निर्भर थे। उनके माता-पिता ने वर्षों तक उनकी देखभाल की। रिपोर्ट्स के अनुसार, इलाज के लिए परिवार को अपना घर तक बेचना पड़ा। यह सिर्फ एक मेडिकल केस नहीं था, बल्कि एक परिवार की लंबी पीड़ा थी।

परिवार का फैसला और सुप्रीम कोर्ट की अनुमति


इतने लंबे समय तक कोई सुधार न होने के बाद, हरीश राणा के परिवार (खासकर उनके पिता) ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कहा कि बेटे के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है, वह केवल “जिंदा रखा जा रहा है” और यह जीवन नहीं, बल्कि पीड़ा है। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया पहुंचा। मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा कि हरीश राणा के लाइफ सपोर्ट (feeding tube आदि) हटाए जा सकते हैं। यह भारत में पहली बार हुआ जब अदालत ने किसी व्यक्ति के लिए व्यवहारिक रूप से इच्छा मृत्यु लागू करने की अनुमति दी।

इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया: कैसे लागू किया गया


कोर्ट के आदेश के बाद हरीश राणा को AIIMS में भर्ती किया गया और उन्हें पैलिएटिव केयर (अंतिम देखभाल) यूनिट में रखा गया। इसके बाद धीरे-धीरे उनकी फीडिंग ट्यूब और लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई। डॉक्टरों ने यह प्रक्रिया बहुत सावधानी से की, ताकि उन्हें कोई दर्द न हो और उनकी मृत्यु “गरिमा” के साथ हो। पूरी प्रक्रिया में लगभग 15–30 दिन तक का समय लगने की संभावना बताई गई।

अंतिम क्षण: एक भावनात्मक विदाई

जब प्रक्रिया शुरू हुई, तो परिवार ने उन्हें अंतिम विदाई दी। एक वीडियो में परिवार के लोग भावुक होकर कह रहे थे— “सबको माफ कर दो, सबकी माफी मांग लो…” यह सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं था, बल्कि एक पिता द्वारा अपने बेटे को जाने देने का सबसे कठिन निर्णय था।

हरीश राणा का मामला एक ऐसी सच्चाई सामने लाता है जहाँ एक दुर्घटना ने जीवन छीन लिया, 13 साल तक शरीर जिंदा रहा लेकिन जीवन नहीं, और अंत में परिवार को ही “छोड़ने” का फैसला लेना पड़ा। यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि दर्द, मजबूरी और मानव संवेदनाओं की सबसे कठिन परीक्षा है।

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