अरावली पर्वतमाला: भारत की प्राचीन ढाल पर मंडराता आधुनिक संकट क्यों चर्चा में अरावली Jagriti PathJagriti Path

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Sunday, December 21, 2025

अरावली पर्वतमाला: भारत की प्राचीन ढाल पर मंडराता आधुनिक संकट क्यों चर्चा में अरावली

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Aravali

Aravali-mountain अरावली पर्वतमाला क्या है संकट और बचाओ आंदोलन 


अरावली पर्वतमाला भारत की आत्मा में बसी हुई वह प्राचीन भू-संरचना है, जिसने करोड़ों वर्षों से इस उपमहाद्वीप को मरुस्थल बनने से बचाया है। यह केवल पत्थरों और चट्टानों का समूह नहीं है, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरण, जल, वायु और जीवन का प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। आज अरावली एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार कारण उसकी सुंदरता नहीं, बल्कि उस पर मंडराता गंभीर खतरा है। हाल के न्यायिक फैसलों, खनन गतिविधियों और “अरावली बचाओ” जैसे आंदोलनों ने इसे राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है।
अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में गिनी जाती है। इसका निर्माण हिमालय से भी पहले हुआ था, जब पृथ्वी की सतह आज जैसी नहीं थी। यह पर्वतमाला गुजरात से शुरू होकर राजस्थान के हृदय से गुजरती हुई हरियाणा और दिल्ली तक फैली है। इसका फैलाव लगभग 700 किलोमीटर का है। समय के साथ यह पर्वतमाला ऊँचाई में घिसती चली गई, लेकिन इसकी पर्यावरणीय भूमिका कम नहीं हुई। आज भी यह थार मरुस्थल और उपजाऊ मैदानी इलाकों के बीच एक प्राकृतिक दीवार की तरह खड़ी है। हाल ही में कोर्ट ने यह भी कहा है कि केंद्र सरकार और MoEF&CC की समिति की सिफारिशें स्वीकार की गई हैं, और अब sustainable mining (टिकाऊ खनन) योजना तैयार की जाएगी। 

अरावली पर्वतमाला की उत्पत्ति और भौगोलिक विस्तार 


अरावली पर्वतमाला : उत्पत्ति, विस्तार और भौगोलिक स्वरूप
अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक मानी जाती है। इसकी उत्पत्ति प्रीकैम्ब्रियन युग में लगभग 100 से 150 करोड़ वर्ष पहले हुई थी। यह पर्वतमाला प्राचीन भू-पर्पटी की हलचल, भ्रंशन (faulting) और दीर्घकालीन अपरदन का परिणाम है। हिमालय की तरह यह नवीन वलित पर्वत नहीं है, बल्कि अत्यधिक अपक्षय और क्षरण के कारण आज इसकी ऊँचाई कम दिखाई देती है। भूवैज्ञानिक दृष्टि से अरावली कठोर आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों से बनी है, जिनमें ग्रेनाइट, नाइस और शिस्ट प्रमुख हैं।
अरावली पर्वतमाला का भौगोलिक विस्तार उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में फैला हुआ है। इसकी शुरुआत गुजरात के पालनपुर क्षेत्र से मानी जाती है और यह राजस्थान के मध्य भाग से होती हुई हरियाणा तथा दिल्ली तक पहुँचती है। इसका कुल विस्तार लगभग 700 से 800 किलोमीटर तक है। राजस्थान में यह पर्वतमाला राज्य को लगभग दो असमान भागों में बाँटती है—पश्चिम में मरुस्थलीय क्षेत्र और पूर्व में अपेक्षाकृत उपजाऊ मैदान। अरावली की सबसे ऊँची चोटी गुरु शिखर (माउंट आबू) है, जिसकी ऊँचाई लगभग 1722 मीटर है।
भौगोलिक दृष्टि से अरावली पर्वतमाला जल विभाजक (जलागम) की भूमिका निभाती है। इसके पूर्वी ढाल से बहने वाली नदियाँ जैसे बनास, साबरमती और लूनी की सहायक धाराएँ वर्षा जल को एकत्र करती हैं। यह पर्वतमाला थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने, भू-जल पुनर्भरण में सहायता करने और उत्तर-पश्चिम भारत की जलवायु को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस प्रकार अरावली पर्वतमाला न केवल भारत की प्राचीन भू-संरचना का उदाहरण है, बल्कि वर्तमान पर्यावरणीय संतुलन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अरावली का पर्यावरणीय महत्व Environmental importance of Aravali


अरावली का सबसे बड़ा योगदान यह है कि यह थार मरुस्थल के विस्तार को रोकती है। यदि अरावली न होती, तो राजस्थान का रेगिस्तान धीरे-धीरे हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैल चुका होता। अरावली की पहाड़ियाँ गर्म हवाओं और रेत के तूफानों को रोकने का काम करती हैं। इसके अलावा, यह पर्वतमाला मानसून की हवाओं को प्रभावित कर वर्षा के पैटर्न को भी संतुलित करती है।
अरावली क्षेत्र भू-जल पुनर्भरण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी चट्टानें और दरारें वर्षा के पानी को जमीन के भीतर समाहित करती हैं, जिससे आसपास के इलाकों में कुएँ, बावड़ियाँ और ट्यूबवेल जीवित रहते हैं। दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में जहां पानी का संकट लगातार बढ़ रहा है, वहां अरावली का संरक्षण जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन चुका है।
यह क्षेत्र जैव विविधता से भी भरपूर है। यहाँ तेंदुआ, सियार, नीलगाय, लोमड़ी, मोर और सैकड़ों पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं। कई दुर्लभ वनस्पतियाँ भी अरावली की ढलानों पर उगती हैं, जो औषधीय और पारिस्थितिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

अरावली पर्वतमाला आज चर्चा में क्यों है? Why is Aravalli mountain range in discussion today?


हाल के वर्षों में अरावली लगातार चर्चा में रही है, लेकिन हाल ही में यह मुद्दा इसलिए उभरा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने अरावली की कानूनी परिभाषा को लेकर बड़ा बदलाव कर दिया। अदालत ने “अरावली हिल्स” की पहचान के लिए 100 मीटर की ऊँचाई (लोकल रिलीफ) को आधार माना। इसका अर्थ यह हुआ कि जिन पहाड़ियों की ऊँचाई 100 मीटर से कम है, वे कानूनी रूप से अरावली के दायरे से बाहर मानी जा सकती हैं।
यहीं से विवाद शुरू हुआ। पर्यावरणविदों का मानना है कि अरावली की अधिकांश पहाड़ियाँ ऊँचाई में कम हैं, लेकिन पारिस्थितिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। केवल ऊँचाई के आधार पर उन्हें अरावली से बाहर कर देना प्रकृति की वास्तविक संरचना को नज़रअंदाज़ करने जैसा है। इस फैसले के बाद आशंका जताई गई कि बड़े क्षेत्र खनन, निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों के लिए खुल सकते हैं।

अरावली बचाओ अभियान क्यों चला Why was the Aravali Bachao campaign started?


सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को अरावली पर्वतमाला से संबंधित एक महत्वपूर्ण आदेश दिया जिसमें:
“अरावली हिल” की परिभाषा को 100 मीटर ऊँचाई (local relief) से जोड़ा गया। केवल उन पहाड़ियों को ही कानूनी रूप से अरावली माना जाएगा जो 100 मीटर से ऊँची होंगी।
 कोर्ट ने नए खनन पट्टों (mining leases) पर प्रतिबंध लगाया है जब तक कि एक सस्टेनेबल माइनिंग प्लान तैयार नहीं हो जाता। इसी चिंता ने “अरावली बचाओ” अभियान को जन्म दिया। यह अभियान केवल एक नारा नहीं है, बल्कि एक व्यापक जन-आंदोलन बनता जा रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरण विशेषज्ञ, ग्रामीण समुदाय और युवा वर्ग इस अभियान से जुड़ रहे हैं। सोशल मीडिया पर यह मुद्दा तेजी से फैला और फिर सड़कों तक पहुँचा।
इस अभियान के पीछे मुख्य भावना यह है कि अरावली को केवल कानूनी परिभाषाओं के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक जीवित पारिस्थितिक तंत्र है, जिसे छोटे-बड़े पहाड़ों में बाँटकर नहीं समझा जा सकता। आंदोलनकारियों का कहना है कि यदि आज अरावली को कमजोर किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ पानी, स्वच्छ हवा और संतुलित जलवायु के लिए संघर्ष करेंगी।
कई गाँवों में लोगों ने उपवास, धरना और जनसभाएँ कीं। उनका कहना है कि अरावली उनके जीवन का आधार है। यहाँ के जंगल, पानी और भूमि ही उनकी आजीविका हैं। पहाड़ों का विनाश सीधे उनके अस्तित्व पर हमला है।

अरावली पर्वतमाला को क्या खतरा है? What is the threat to Aravali mountain range?


अरावली के लिए सबसे बड़ा खतरा अनियंत्रित खनन है। दशकों से यहाँ पत्थर, बजरी और खनिजों का अवैध और अर्ध-कानूनी खनन होता रहा है। इससे पहाड़ियाँ खोखली हो गई हैं, जंगल कट गए हैं और जल स्रोत सूखते जा रहे हैं। कई जगहों पर पहाड़ पूरी तरह गायब हो चुके हैं।
दूसरा बड़ा खतरा शहरीकरण और निर्माण गतिविधियाँ हैं। दिल्ली-एनसीआर और राजस्थान के कई इलाकों में अरावली की जमीन पर फार्महाउस, रिसॉर्ट, सड़कें और औद्योगिक क्षेत्र बनते जा रहे हैं। इससे न केवल हरित क्षेत्र घट रहा है, बल्कि प्राकृतिक जल निकासी और वायु प्रवाह भी बाधित हो रहा है।
जलवायु परिवर्तन भी अरावली के संकट को बढ़ा रहा है। अनियमित वर्षा, अत्यधिक तापमान और लंबे सूखे इसके पारिस्थितिक संतुलन को कमजोर कर रहे हैं। यदि इन प्राकृतिक दबावों के साथ मानव-निर्मित विनाश जुड़ गया, तो स्थिति और भयावह हो सकती है।

अरावली के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का फैसला और उसका अर्थ
Supreme Court's decision and its meaning in the context of Aravali


सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में एक ओर नए खनन पट्टों पर रोक लगाने की बात कही, जब तक कि एक टिकाऊ खनन योजना तैयार न हो जाए। यह एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है। लेकिन दूसरी ओर, अरावली की परिभाषा को सीमित करना कई सवाल खड़े करता है।
अदालत ने तकनीकी आधार पर निर्णय दिया, लेकिन पर्यावरणीय मुद्दे केवल तकनीकी नहीं होते। प्रकृति को गणितीय मापदंडों में बाँधना हमेशा सही परिणाम नहीं देता। आलोचकों का कहना है कि यह फैसला भविष्य में अरावली के बड़े हिस्से को संरक्षण से बाहर कर सकता है।
यह मामला अब केवल न्यायिक नहीं रहा। यह नीति, पर्यावरण और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। सरकार, अदालत और समाज—तीनों को मिलकर यह तय करना होगा कि विकास का रास्ता प्रकृति को कुचलकर जाएगा या उसके साथ संतुलन बनाकर।


क्या होगी अरावली पर्वतमाला के भविष्य की राह Future of Aravalli 


अरावली को बचाने के लिए केवल आंदोलन या अदालत के फैसले पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए दीर्घकालिक नीति, सख्त कानून और जन-जागरूकता आवश्यक है। खनन पर वास्तविक नियंत्रण, अवैध निर्माण पर सख्ती और बड़े पैमाने पर पुनर्वनीकरण की जरूरत है।
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अरावली को विकास की बाधा नहीं, बल्कि विकास की आधारशिला माना जाए। यदि यह पर्वतमाला सुरक्षित रहेगी, तो पानी, हवा और जलवायु भी सुरक्षित रहेगी। और यही किसी भी स्थायी विकास की सबसे मजबूत नींव है।

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