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| अपराधियों का एनकाउंटर |
सब जानते है यह हमारी वही पुलिस हैं जिनको आज मुर्दाबाद की जगह जिन्दाबाद और पत्थरों की जगह फूलों की वर्षा देखने को मिल रहीं हैं।
सही क्या ग़लत क्या इसी समझ को विवेकी और बुद्धिजीवी की परिभाषा दी जाती है। जब हम यथार्थवाद और विवेकशील बात न करके अवसरवादी ही रहेंगे और भेड़ चाल के शिकार होते रहेंगे तो हम समस्याओं और विरोधाभास में घिरे रहेंगे। क्योंकि हम सब हमारे हिसाब से ही करवाना चाहते हैं।
जहां तक हो ऐसे अपराध नहीं हो और नहीं इस तरह बाद की प्रक्रिया ।
दोनो बातों पर सवाल खड़े होते हैं। जबकि हमें तीसरे पक्ष की ओर जाना होता है। अगर आप अवसरवादी हैं तो आपको भविष्य में सवाल करने का कोई हक नहीं है भले ही आप पीड़ित पक्ष या अपराधी पक्ष के करीब है।
पहला पक्ष
1 आखिर समाज में दरिंदगी क्यों हुई ऐसा करने में उन दरिंदों के मस्तिष्क को किसने भयरहित बनाया?
2 हम पहले उन असामाजिक तत्वों के खिलाफ आवाज क्यो नही उठाते जब हमे आशंका भी होती है कि यह ऐसा कार्य कर सकते हैं?
3 अपराधों से पहले हमारी नींद नहीं उड़ती?हम आय के लालस शराब आदि युवाओं तक पहुंचाने में सहयोग क्यो करते हैं?
4 हमारे परिवेश में सुरक्षा और अपराधभय के पैमाने को जमींदोज किसने किया?
5 जब अपराधी हमारे नज़दीकी होते हैं तो हम उन्हें बचाने की चेष्टा क्यों रखते हैं, अपराधियों को सजा दिलाने में असमानता क्यो हैं?
दुसरा पक्ष
1 पुलिस उन आरोपियों को इतनी लापरवाही से घटना स्थल पर से क्यो लाई कि वे भागने और हमले की स्थिति में थे?
2 हाथों में हथकड़ी डालकर क्यो नहीं मजबूत दस्ते के साथ लाया गया?
3 यदि दूर्भाग्य से अपराधी पिस्तौल हड़पने में कामयाब होते तो क्या होता?
4 क्या कभी अन्य मामलों में पुलिस की मंशा रहेगी कि हम अपने हिसाब से तमाम कर दें।
5 क्या अपराधी और भी है जो अपनी पहुंच और धनबल पर अदालत में जांच प्रक्रिया में हैं उनका भी एनकाउंटर होना चाहिए अपने बचाव में भागने की कोशिश कई बार होती है ?उनके पीछे गोली चलाई गई या चलाई जाएगी?
तीसरा पक्ष।
1 क्या इस तरह हमारी कानुन व्यवस्था मूकदर्शक बन कर रह गई तो अरबों की जनसंख्या वाले देश में शान्ति व्यवस्था कानुनन चलना सम्भव है?
2. आप अगर किसी जांच के अधीन अपराधी के परीजन हो क्या आप स्वीकार करोंगे?
3. अगर कोई निर्दोषी अपराधियों के झुण्ड में मारा गया तो आपको सवाल करने की जगह होगी?
4 हम जानते हैं दर्द और आक्रोश स्वभाविक है लेकिन भविष्य में कभी लोगों की जल्दबाजी में बिना अदालत सजा पुलिस की कोई चूक केस की जटिलता में आपका सत्य दबता हो तो आप की बात सुनने के अवसर आप खो तो नहीं रहें?
5 अगर हमारी वर्तमान कानुनी सुरक्षा और अदालत होने के उपरांत कानुन लोगों के आग्रह और आवेश का रूप लेकर सुरक्षाकर्मियों के हाथ या प्रभावशाली लोगों के हाथ में आ जाएगा तो नवीन संकटों के खिलाफ आप अपनी आवाज फिर किस दृष्टिकोण से उठायेंगे। कहीं अकेले पड़ गए तो यह दोष मत देना कि स्थति को समझा नहीं गया। यह सबसे बड़ा सवाल होगा।
"वैसे इस मामले कुछ कहने की आवश्यकता और जगह नहीं है क्योकि एक निर्दोष महिला की निर्मम तरीके से जान ली गई! निसंदेह दरिंदों को जीने का कोई अधिकार नहीं था। "
हम कायदे तय करवाने और बदलने की ज़िद में यह नहीं समझते कि जो सवाल उठगे वो फिर हम ही पीछे मुड़कर यही सवाल पूछेंगे।
अब आप कहेंगे कि आखिर यह सही हुआ या गलत
इसका उत्तर निष्कर्ष पर यही है कि भविष्य को नजरंदाज करके हर पहलू हर निर्णय और परिस्थितियां आप अपने ही हिसाब व तरीके के अनुकूल चाह ही रहे हो तो ठीक ही हुआ है 'जैसे को तैसा"
लेकिन कुछ तो समस्याएं सामने आयी तभी तभी तो न्यायिक , संवैधानिक, प्रक्रियाओं की नियमावली अमल में लाई गयी । वरना अपराधियो सिर धड़ से अलग तो कई सदियों पहले किये जाते थे।
कभी परिस्थितियां विपरीत हो ; आपको लम्बे विचार विमर्श के बाद बनी सर्वश्रेष्ठ, सर्वहितकारी, लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था की जरूरत पड़े तो आपा मत खोना । ध्यान रखना लोग यह ही होंगे और नजरिया उनका होगा। क्योंकि लोगों के नजरिए से और आवेश से देश चलना संभव नहीं है। वरना अपराधियो सिर धड़ से अलग तो कई सदियों पहले किये जाते थे वे ठीक होते तो लोकतंत्र ,और राज्य व्यवस्था के लिए लड़े क्यों ? गोलियां तो अंग्रेजी हुकूमत के समय भी न्याय की नाल बन कर चली थी।
मैं आज खुश हूं बिटिया को न्याय मिलने पर। लेकिन डर लोगों की चलन का हैं जो बदलते बहुत हैं। समझते कम है।
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यह मेरे अपने विचार हैं भारत की गरिमा , एकता-अखंडता में मेरा हित है।
रमेश कुमार
लेखक, रचनाकार, आशावादी विचारक

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